मन से मन की

मेरी अनहद१ बाँसुरी
प्रलय की धुन सुनाती है।
कातर२ आँखें,
जन-जीवन से पृथक्
दृष्टि-अनुलेपन३ करती हैं,
काल के कपोलों पर।
मुझ पर दृष्टि चुभोती,
विहँसती, अल्हड़ गौरैया
पंख झाड़, फुर्र हो जाती है।
मेरे मन को तलाश↑ है,
एक निस्तब्ध४-निस्पन्द५
नीरव६-निभृत निलय७ की,
जहाँ सत्, चित्, आनन्द
द्वैत को परे धकेल
अद्वैत के साथ संवाद करते दिखें।
विचार-विनिमय८ का सेतु,
हेतु९ सिद्ध कर सके।
आओ!
विश्रान्त-से१० दिखते पाँवों को
क्लान्त११ मन: दशा से मुक्त कर,
श्रमसाध्य१२ पगचिह्नो से जोड़ें।
बद्ध संवेदना मुक्त कर
प्रार्थना स्वयं से स्वयं की करें।
जानते हो न,
आयातित आशीर्वाद की भित्ति
बालुकामयी होती है?

↑तलाश ‘तुर्की’ भाषा का शब्द है।
क्लिष्ट शब्दार्थ :–

१क्षुब्ध २विवश ३भली प्रकार से दृष्टि दौड़ाना ४निष्चेष्ट ५स्थिर ६ध्वनिरहित/शब्दरहित ७एकान्त स्थान ८आदान-प्रदान/लेना-देना ९प्रयोजन १०ठहरे हुए-से ११थके हुए १२श्रम साधने-योग्य।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ नवम्बर, २०२३ ईसवी।)