मन से मन की

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मेरी अनहद१ बाँसुरी
प्रलय की धुन सुनाती है।
कातर२ आँखें,
जन-जीवन से पृथक्
दृष्टि-अनुलेपन३ करती हैं,
काल के कपोलों पर।
मुझ पर दृष्टि चुभोती,
विहँसती, अल्हड़ गौरैया
पंख झाड़ फुर्र हो जाती है।
मेरे मन को तलाश^ है,
एक निस्तब्ध४-निस्पन्द५
नीरव६-निभृत निलय७ की,
जहाँ सत्, चित्, आनन्द
मेरे जीवात्मा के साथ
संवाद कर सकें;
विचार-विनिमय८ का सेतु,
हेतु९ के लिए सिद्ध हो सके।

^ तलाश ‘तुर्की’ भाषा का शब्द है।

क्लिष्ट शब्दार्थ :–

१क्षुब्ध २विवश ३भली प्रकार से दृष्टि दौड़ाना ४निष्चेष्ट ५स्थिर ६ध्वनिरहित/शब्दरहित ७एकान्त स्थान ८आदान-प्रदान/लेना-देना ९प्रयोजन।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)