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राष्ट्रवाद को खा रहा, ‘अतिवादी आचरण’!

समयसत्य चिन्तन ०——

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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एक और ‘भारत’ के साथ बँटवारे का बीभत्स खेल शुरू हो गया है। पहली ओर, हिन्दू है और दूसरी ओर, मुसलमान। भारतवासियों का बौद्धिक-मानसिक स्तरवर्द्धन करने के स्थान पर उनके मन-बुद्धि में ‘साम्प्रदायिकता’ का विष-बीज-वपन किया जा रहा है। इस तरह का आचरण करनेवाले प्रथम श्रेणी के ‘राष्ट्रद्रोही’ हैं। जो संवैधानिक संस्थाओं और समाज को सच्चा आईन: दिखाने की भूमिका का बहुविध निर्वहण करनेवाले मीडियातन्त्र और प्रबुद्धवर्ग को डरा-धमकाकर अपनी प्रभुता का प्रदर्शन करते आ रहे हैं, ऐसे राष्ट्रद्रोहियों को इस विषय पर चिन्तन-अनुचिन्तन करना होगा कि जिस प्रकार कोई भी ‘सम्प्रदाय’ किसी की निजी सम्पदा नहीं है उसी प्रकार ‘राष्ट्रीयता’ भी किसी की ‘बपौती’ नहीं है। कोई यह प्रदर्शित करना चाहे कि राष्ट्रीयता उसी की रक्तवाहिनियों में उबाल मार रही है तो यह उसके ‘एकपक्षीय’ बोधस्तर का नितान्त निकृष्ट दृष्टान्त है।

इससे बढ़कर ‘राष्ट्रीय’ विडम्बना और क्या हो सकती है कि राष्ट्रीयता के नाम पर किसी ‘सम्प्रदाय-विशेष’ को ‘कठघरे’ में ला खड़ा किया जाये और अन्य सम्प्रदाय को महाराष्ट्रभक्त बताकर समादृत किया जाये। कोई भी ‘बलप्रयोग’ करके राष्ट्रीयता का परचम न तो लहरा सकता है और न ही लहरवा सकता है। राष्ट्रीयता का ‘अतिरिक्त जोश’ मार रहा हो तो ऐसे वातावरण तैयार करने की आवश्यकता है, जिससे प्रभावित होकर देश का एक-एक व्यक्ति “वन्दे मातरम्” का गायन करने के लिए तत्पर हो जाये। ‘घृणा’ का प्रचार-प्रसार कर, अपने उल्लू सीधा करनेवाले मुखौटेधारियों से आज देश की सम्प्रभुता की रक्षा करने की आवश्यकता है।

पराधीन राष्ट्रीयता का औचित्य क्या है? जिनके हाथों में सत्ता है; सम्प्रभु बनकर स्वेच्छाचारिता का परिचय देते आ रहे हैं और जो कृत्रिम सर्वशक्तिमान्-सा व्यर्थ का हुंकार भर रहे हैं; उनकी बीभत्स और निर्मम नीतियों के परिणाम के कारण आज जनसामान्य त्रस्त होकर रह गया है। महँगाई, कदाचार, अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार, पापाचार आदिक कुत्सित प्रवृत्तियों के वय-वार्द्धक्य होने के कारण देश की औसत जनता भयातुर है।

आप ऐसा वातावरण तैयार कीजिए, जिससे प्रभावित होकर सभी नागरिक समवेत स्वर में ‘भारतीयता’ का परिचय दे सकें। हर समय किसी ‘एक’ के पीछे पड़ना, राष्ट्रीयता के मूल में ‘मट्ठा’ डालने के समान है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३अगस्त, २०२१ ईसवी।)