पाँच राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों का विश्लेषण

राम वशिष्ठ-


पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे कल देर रात तक प्राप्त हुए । इन चुनावों विशेषकर हिन्दी पट्टी के राज्य मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए सेमिफाइनल जैसा माना जा रहा था । इन तीन राज्यों के चुनाव परिणाम को सत्तारूढ़ पार्टी की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा था ।

मिजोरम के चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस की बेहद बुरी हार हुई और उसके मुख्यमंत्री अपनी दोनों सीटो पर हार गए । वहां मिजो नेशनल फ्रंट ने 40 में से 26 सीटे जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया और सत्तारूढ़ कांग्रेस के हिस्से मात्र 5 सीटे आयी । भाजपा को एक सीट मिली । वैसे भी यहां पर भाजपा का खास जनाधार नहीं है । लेकिन पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखिरी किला भी ढ़ह गया । अब बात तेलंगाना की करते है । राज्य में 119 में से 88 सीटे जीतकर के0 चंद्रशेखर राव की पार्टी TRS ने प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता में धमाकेदार वापसी की है । यहां चंद्रशेखर राव का समय से पहले विधानसभा भंग कर चुनाव कराने का दांव एकदम सही पड़ा । यहां पर भी कांग्रेस को नुकसान हुआ और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी से गठबंधन करके भी यह गठबंधन कुल 21 सीटे जुटा सका । यहां भाजपा को एक सीट ही मिली । निश्चित रूप से भाजपा का तेलंगाना में मजबूत जनाधार नहीं है लेकिन जिस तरह से भाजपा ने यहां प्रचार किया था उसे देखते हुए उसे ज्यादा सीटे मिलने की उम्मीद थी पर भाजपा यहां नाकाम रही । दरअसल तेलंगाना में कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र के जरिए साम्प्रदायिक कार्ड खेला था और भाजपा ने कांग्रेस पर चुनाव प्रचार में काउंटर अटैक किया था जिसका नतीजा ये रहा कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे वोट पाने की उम्मीद करते रह गए जबकि चंद्रशेखर राव विकास की बात करके बाजी मार ले गए ।

तेलंगाना के चुनाव परिणाम का सीधा असर आगामी लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है । लोकसभा चुनाव के लिए जहां चंद्रबाबू नायडू से कोई राष्ट्रीय पार्टी गठबंधन करने में हिचकिचाहट महसूस करेगी तो वही TRS के साथ कांग्रेस और भाजपा दोनों गठबंधन करना चाहेगी । इस चुनाव परिणाम के सहारे राव गठबंधन करने वाली पार्टी के साथ अपनी शर्तो पर गठबंधन करने की स्थिति में आ गए हैं ।

अब बात करते हैं हिन्दी पट्टी के तीन राज्यों की । यहां पर दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच ही मुख्य मुकाबला होता है । इन सभी राज्यों में बीजेपी की सरकार थी और अब कांग्रेस की सरकार बनने जा रही हैं । मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 साल से बीजेपी सत्ता पर काबिज थी । मध्य प्रदेश में जहां कांटे का मुकाबला रहा वही छत्तीसगढ़ के नतीजों ने सभी को चौंकाया हैं । छत्तीसगढ़ की 90 सीट में से कांग्रेस को 68 सीटों का प्रचंड बहुमत मिला हैं और भाजपा 15 सीटों पर सिमट कर रह गयी । बसपा को 2 तो अजीत जोगी की पार्टी को 5 सीट । सभी एक्जिट पोल छत्तीसगढ़ में खंडित जनादेश बता रहे थे परन्तु नतीजों ने सबको गलत साबित किया । निश्चित रूप से 15 साल की एंटी इनकमबैंसी एक फैक्टर हैं । लेकिन बसपा और अजीत जोगी की पार्टी का गठबंधन भी भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है । छत्तीसगढ़ में बहुमत कांग्रेस के लिए संजीवनी हैं तो भाजपा को तगड़ा झटका । यहां रमन सिंह ने विकास तो किया था लेकिन उनको ठीक उसी प्रकार की एंटी इनकमबैंसी झेलनी पड़ी जैसी शीला दीक्षित ने दिल्ली में झेली थी ।

मतलब अपने विकास को वो आम आदमी को महसूस नहीं करा सके और सत्ता से बाहर हो गए । नक्सल समस्या भी एक कारण है । क्योंकि नोटबंदी ने नक्सलवाद की कमर तोड़ दी थी और नक्सली सम्पर्क में रहने वाले वो लोग जो वोट भी करते हैं बिल्कुल आम लोगो में घुलमिलकर रहते हैं वो सरकार के खिलाफ माहौल बना रहे थे साथ ही जब नोटबंदी के बाद सब कुछ सामान्य हो गया तो नक्सली हमलों में तेजी आयी क्योंकि नक्सली नोटबंदी की मार से कुंठित होकर अब ज्यादा हमले कर रहे थे । इससे आम जन सरकार से नाराज हो चला । इस प्रकार रमन सिंह सरकार ने दोनों पक्ष से नुकसान उठाया । मध्य प्रदेश में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है । यहां भी 15 साल की एंटीइनकमबैंसी थी । लेकिन इसके साथ ही मध्य प्रदेश की आंतरिक स्थिति बहुत गडबड थी । एनसीआरबी के आंकड़े के हिसाब से मध्य प्रदेश में रेप और महिलाओं के प्रति हिंसा के मामले सर्वाधिक हैं । पुलिस द्वारा आम आदमी के उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के मामलों में भी मध्य प्रदेश टॉप थ्री स्टेटस में था । ऐसी स्थिति में जनता सरकार के खिलाफ थी । राजस्थान में बीते 25 साल से सरकार बदलने की रवायत रही हैं और इस बार भी यही हुआ । भाजपा को उम्मीद थी कि वह इस मिथक को तोड़ देगी लेकिन ऐसा हो नहीं सका । राजस्थान की मुख्यमंत्री आम आदमी से कनेक्ट नहीं हो सकी उनकी कार्यशैली में एक अंहकार झलकता था जो हार की वजह बना । साथ ही पदमावती फिल्म के मुद्दे पर सरकार ने आम आदमी के मन का कदम नहीं उठाया था । यहां और मध्य प्रदेश में भी एसी एसटी एक्ट में संशोधन सरकार को भारी पड़ा ।

अगर नेताओं पर इस चुनाव परिणाम के असर को देखे तो निश्चित ही कांग्रेस में सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद पहले के मुकाबले काफी बढ़ गया है । कमलनाथ, अशोक गहलौत और राजनीति के हाशिए पर पहुंच चुके दिग्विजय सिंह को कुछ उर्जा महसूस हो रही होगी । वसुंधरा राजे की बात करें तो जिस तरह की राजनीति वो करती हैं उस हिसाब से इस हार से उनको कोई खास फर्क नहीं पड़ता है वो जैसी हैं वैसी ही रहेंगी लेकिन रमन सिंह और शिवराज चौहान के लिए यह बड़ा झटका है । वो तेजी से राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ रहे थे लेकिन अब वो रूक जायेगे । यह चुनाव परिणाम दोनों के राजनीतिक कद को कम तो नहीं कर रहा है लेकिन कद बड़ा होने की गति पर अंकुश जरूर लगा रहा है ।

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