अटल के पटल बन्द हों सब विकल,
उनकी पीड़ा नहीं अब सही जा रही।
अपने हों या पराए दुखी सब दिखें,
उनके दर्शन को जनता झुकी जा रही।।
अब तक जो किया और जैसा रहा,
हे प्रभो माफ कर अब शरण लीजिए।
प्राणदाता विधाता यह विनती सुनो,
शीघ्र संकट से अब तो मरण दीजिए।।
जन-मन की सेवा भारत में कर,
काव्य की धारा अविचल बही प्रेम की।
कोई विरोधी गति का रोधी नहीं,
ऐसी शब्दों की बौछार वाणी ने की।।
‘परदेशी‘ दुखी मिल ना पाया कभी,
तुमने उसमें जगाई अलख काव्य की।
वन्दन वह करेे अभिनन्दन तुम्हें,
यह तो किस्मत बेचारी र्दुभाग्य की।।
रचयिता- सुधीर अवस्थी ‘परदेशी‘ पत्रकार हिन्दुस्तान बघौली, हरदोई (उ0प्र0)