जय बोलो ‘बेईमान’ की!

जय बोलो ‘बेईमान’ की!
यह है, ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’, प्रयागराज का कृत्य!
आप सब नीचे दिख रहे तथाकथित ‘आमंत्रण पत्र’ की हिन्दीभाषा पर दृष्टि-निक्षेपण करेँ।

इस साहित्यिक संस्था का गौरवमय अतीत रहा है; परन्तु जबसे इसका राजनीतीकरण कर दिया गया है तबसे उसमे ‘अयोग्य’, ‘अपात्र’ और ‘कुपात्र’ लोग की भरती (‘भर्ती’ अशुद्ध है।) की जाने लगी है। जो वास्तव मे शब्दशिल्पी हैँ, वे इस एकेडेमी से मुख मोड़ चुके हैँ। यहाँ एक सामाजिक जातिविशेष का वर्चस्व बना हुआ है, जोकि जुगुप्सा का विषय है।

कथित पत्र मे सामान्य शब्दोँ की भी बड़ी संख्या मे अशुद्धि दिख रही है, जोकि उपर्युक्त (‘उपरोक्त’ अशुद्ध है।) एकेडेमी का ‘बीभत्स-काल’ जान पड़ता है।