जियो और जीने दो


 आज विश्व मे आतंकवाद बढ़ता जा रहा है। विज्ञान की उन्नति के साथ ही भौतिक साधनों को एकत्रित करने की होड़ सी मची है। प्रतिस्पर्धा का युग है। लोग भाग-दौड़ की जिन्दगी में अधिक रुपया कमाने की दौड़ में रिश्तों को ताक पर रखकर एक दूसरे से ईर्ष्या द्वेष पाल कर बैठे हैं।

महावीर स्वामी ने कहा था जिओ और जीने दो। ये भावना शनैः-शनैः समाप्त होती जा रही है। मतलबपरस्ती में लोग एक दूसरे का हक छीन रहे हैं। परोपकार दया सदभाव भाईचारे की भावना ण कहाँ दिखती। संस्कार व संस्कृति खत्म होती जा रही है। आदमी मानवीय जीवन मूल्यों से कोसो दूर होता जा रहा है। यही कारण है कि आज आदमी तनाव अवसाद भय के वातावरण में जी रहा है।

विज्ञान का उपयोग शांति व विकास के लिए हो। विश्व ग्राम की कल्पना तभी साकार होगी जब हम जिओ और जीने दो की भावना से आगे बढ़ेंगे तभी वसुधैव कुटुम्बकम की कल्पना साकार होगी।

फैशन की दौड़ में आदमी भारतीय संस्कृति को विस्मृत कर रहे हैं । अर्धनग्न रहकर नशे के आदि नाच गान में अमूल्य समय गंवा रहे हैं। धार्मिक ग्रन्थ रामायण गीता पढ़ने का घर परिवार में रिवाज अब कहाँ दिखता है। रात दिन हर आयु के लोग मोबाइल हाथ मे लिए व्यस्त होने का ढोंग करने लगे हैं। प्रेम सद्भावना कहीं दिखती नहीं। आदमी कितना खुदगर्ज़ होता जा रहा है ।

आज की शिक्षा जीवन मूल्यों की नहीं है मात्र पढ़कर डिग्रियाँ बटोरने वाले तैयार हो रहे हैं। मात्र नॉकरी के लिए शिक्षा रह गई है। व्यवहारिक ज्ञान जीने का अनुभव उनमें कहीं नजर नहीं आता। मर्यादा का पाठ अब कौन पढता है बड़े छोटों से कैसे रहना अब कौन सीखता है। एकल परिवारों ने आपसी प्रेम भाईचारा सब खत्म कर दिया। आजकल बच्चे दादा दादी तक को नहीं जानते। संयुक्त परिवार टूट कर जब से बिखर गए । छोटे बच्चे बुजुर्गों के प्यार को तरस गए।।

डॉ. राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित’
भवानीमंडी