एक ग़ज़ल : मंज़िल की जुस्तजू में भटकता रहा

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


सदा देकर भी, सदा दे न सका,
मुलाक़ात हुई, पर मिल न सका।
जो सौग़ात उनकी हथेली पे रखा था,
देकर भी उन्हें, कुछ दे न सका।
आँखों के सवाल नामुराद रह गये,
जवाब देकर भी जवाब दे न सका।
मंज़िल की जुस्तजू में, भटकता रहा,
राह चलता रहा, पर चल न सका।
ऐ ज़िन्दगी! किस मोड़ पे ला दिया,
साथ रहकर भी संग रह न सका।