डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
मैं तुम्हारे दर्द का हिस्सेदार हूँ,
तुम हमारा दर्द मगर जानते नहीं।
मैं वफ़ा में मिट रहा हूँ, ख़ुश रहो,
ये जानता हूँ तुम हमें मानते नहीं।
हर कदम तुमने जज़्बात रौंदे हैं,
बेवफ़ाई के सिवा कुछ जानते नहीं।
हमने चाहा था तुम्हें ख़ुद से ज़्यादा,
तुम मगर चाहत को पहचानते नहीं।
तेरी ख़ातिर हम ख़ुद खो गये,
तुम हमे अपना कभी मानते नहीं।
तेरे नाम कर दी मैने ये ज़िंदगी,
तुम हमारे प्रेम को पहचानते नहीं।
ज़ख़्म देकर पूछते हो हाल मेरा,
क्या तुम्हें ये घाव अब दिखते नहीं?
हम मुस्कुरा देते हैं तुम्हारी बात पर,
तुम मगर आँखों मे मेरी झाँकते नहीं।
तेरी यादों में गुज़रती है शामोसहर,
तुझे मेरे खयाल तक आते नहीं।
हमने हर खुशी दुआ मे दे डाली,
ऐ बेगैरत मगर तुम मानते नहीं।