जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद)

अब नवाबों के शहर से ज़वाब आना है,
शायद! हकीक़त में रुआब आना है।
आज क्यूँ धड़कने नब्ज़ टटोल रही हैं?
बदलाव आएगा या नया हिज़ाब आना है।
लबों की गुज़ारिश शायद! वो मान लें,
वरना बे-सब्र निगाहों में सैलाब आना है।
काँटों पे चलते – चलते थक से गये हैं,
उम्मीद करते हैं कि अब गुलाब आना है।
वायदा निभाने की फ़ित्रत तो नहीं लगती,
आज मेरे भरोसे का हिसाब आना है।
‘जगन’ कह दो उनसे ज्यादा ग़ुरूर न पालें,
हर पाँच साल में सत्ता का ख़्वाब आना है।