
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
प्राय: देखा गया है कि जब महिला-पुरुष के मध्य विवाद अथवा हाथापाई होती है तो हमारा ‘अन्धा समाज’ बिना सोचे-समझे निराधार होकर ‘महिला’ का पक्षधर बन जाता है; क्योंकि विवेकहीन लोग ‘भीड़’ के पीछे-पीछे चलते हैं।
काफ़ी समय से एक समाचार-चैनल ‘हिन्दू-मुसलमान’ के प्रपंचों का प्रचारक और प्रसारक बना हुआ है। उसका नाम है, ‘ज़ी हिन्दुस्तान’। इसमें एक-से-बढ़कर-एक सूत्रधार (एंकर) ऐसे हैं, जिन्हें अपने दायित्व का अता-पता नहीं है। यही कारण है कि जब इस समाचार-चैनल की ओर से कोई परिचर्चा-जैसा कार्यक्रम आयोजित होता है तब सूत्रधार भी बहती गंगा में हाथ धोने का काम करते/करती हैं; फलत: आयोजन का स्तर इतना विकृतमय हो जाता है कि शालीनता और मर्यादा की नीलामी होने लगती है। यहाँ नीलामी करने की ठीकेदारी सूत्रधार अपने हाथों में ले लेता है। यह स्थिति और शोचनीय बौद्धिक स्तर सभी समाचार-चैनलों का है।
कैसे?
आइए! इसे सप्रमाण समझते हैं और यहाँ जो लोग व्यक्ति-विशेष के प्रति एक-जैसी धारणा बनाये हुए हैं, उन्हें उनकी उस धारणा से मुक्त कर, सत्य का दर्शन कराना इस सम्प्रेषण का उद्देश्य है।
घटना १७ जुलाई, २०१८ ईसवी की है। उस तारीख़ को विवादास्पद समाचार-चैनल ‘ज़ी हिन्दुस्तान’ की ओर से एक कार्यक्रम प्रसारित किया गया था, जिसका नाम था– ‘बताना तो पड़ेगा’। सर्वप्रथम उस कार्यक्रम का नाम ही आपत्तिजनक है। ऐसा इसलिए कि किसी भी समाचार-चैनल अथवा किसी भी मीडिया-इकाई को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भी व्यक्ति को कुछ भी बताने के लिए ‘बाध्य’ करे।
१७ जुलाई को ‘ज़ी हिन्दुस्तान’ की ओर से ‘बताना तो पड़ेगा’ के अन्तर्गत ‘क्या मुस्लिम महिलाओं को मौलानाओं से आज़ादी मिलनी चाहिए?’ विषय पर ‘वाद-विवाद’ कार्यक्रम का ‘सजीव’ प्रसारण किया गया था। उस कार्यक्रम को ‘सजीव’ प्रसारित नहीं करना चाहिए था; क्योंकि उस प्रकार के आयोजन में ‘सूत्रधार’ (एंकर) के निकम्मापन के कारण मर्यादा का हनन होता आया है। कौन-कब-क्या बोल दे अथवा व्यवहार कर दे, कोई नहीं जानता; जबकि समाचार-चैनलवाले ऐसा जानबूझकर करते आ रहे हैं और उन पर कहीं-कोई नियन्त्रण नहीं है।
उक्त आयोजन में सूत्रधार-सहित कुल ९ सहभागी थे, जिनमें महिला सूत्रधार-सहित कुल ६ महिलाएँ थीं, जबकि मात्र ३ पुरुष थे; और सबके-सब विवादास्पद चेहरे थे, जो कि जानबूझकर बुलाये गये थे। यहाँ भी सहभागियों— महिला-पुरुष में समानता नहीं थी। ‘तीन तलाक़-पीड़िता निदा ख़ान के ख़िलाफ़ फ़त्वे जारी करने की आड़ में वैचारिक प्रस्तुति थी। कार्यक्रम के निशाने पर एकमात्र सहभागी मुफ़्ती एजाज अरशद कासमी थे, जो ‘आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के सदस्य हैं।
समाचार-चैनल की सूत्रधार (एंकर) सबीना तामंग थी। आरम्भ में बहस सही दिशा में चल रही थी; परन्तु बीच-बीच में पर्द:नशी महिला निदा ख़ां बुदबुदा रही थी; साथ ही सूत्रधार सबीना, उच्चतम न्यायालय की अधिवक्ता फ़राह फ़ैज़ और सामाजिक कार्यकर्त्री अम्बर ज़ैदी भी मुफ़्ती एजाज अरशद कासमी को लक्ष्य कर संवादहीनता की ओर बढ़ रही थीं। महिला सूत्रधार भी उन्हीं महिलाओं के ‘हाँ-में-हाँ’ मिला रही थी।
महिलाएँ कह रही थीं— हिन्दुस्तान में दो क़ानून नहीं चल सकते। हिन्दुस्तान लोकतन्त्र से चलनेवाला देश है। फ़त्वा देनेवाले पाकिस्तान चले जायें।
महिला सूत्रधार अपने मूल धर्म से हटकर उग्र तेवर के साथ उन्हीं महिलाओं का साथ दे रही थी; जबकि उसे तटस्थ रहना चाहिए था।
उसी बीच, स्वयं को सामाजिक कार्यकर्त्ता कहनेवाली महिला अम्बर ज़ैदी को न जाने क्या सूझा कि वह अभद्र आचरण का परिचय देने लगी। उसने मुफ़्ती कासमी की ओर देखते हुए कहा था—- मर्द बेहूदे होते हैं और भी ऊटपटाँग बोलने लगी। जवाब में मुफ़्ती कासमी ने पूछने की शैली में प्रतिक्रिया की थी– मर्द बेहूदा होता है, तो तेरे पास भाई नहीं है; बाप नहीं है; सब बेहूदा हैं?
उतने में ही शुरू से ही अभद्रता के साथ प्रस्तुत हो रही अम्बर ज़ैदी अपने स्थान से चीख़ते हुए खड़ी हो गयी और हाथ तानते हुए “चुप बतमीज!” कहकर आक्रामक हो चुकी थी, फिर ‘त्रिया-चरित्र’ का परिचय देते हुए, लगभग १९ सेकण्ड के लिए रोने लगी और सूत्रधार उसकी सहायक बनी। ऐसी स्थिति में, सूत्रधार ने कार्यक्रम क्यों नहीं समाप्त कर दिया था? उसी समय एक दूसरी महिला, उच्चतम न्यायालय की अधिवक्ता फ़राह फ़ैज़ भी खड़ी हो गयी और मुफ़्ती कासमी को ढोंगी आदिक कहने लगी। तभी मुफ़्ती कासमी ने उस कार्यक्रम का बहिष्कार कर जाने को खड़ा हुआ तो सूत्रधार सबीना ने रोक लिया। उससे पहले तक सबीना मज़ा ले रही थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उस तरह की घटना कराने के लिए ‘पटकथा’ पहले से ही तैयार कर ली गयी थी।
सभी बैठ चुके थे। तभी बायीं ओर से अम्बर ज़ैदी, दायीं ओर से फ़राह फ़ैज़, बीच में बैठी हुई बरेली की निदा ख़ान ने मुफ़्ती कासमी पर वैचारिक धावा बोल दिया, जिसे उकसाने का काम बेईमान सूत्रधार सबीना तामंग ने किया था, जिसपर मुफ़्ती कासमी बैठे-बैठे धीमी आवाज़ में प्रतिक्रिया करता रहा। अचानक अम्बर ज़ैदी ने मुफ़्ती कासमी से कुछ कहा, फिर निदा और फ़राह ने भी कहा। अब फ़राह और मुफ़्ती कासमी में बहस छिड़ गयी, जो आक्रामक हो गयी। तभी फ़राह और मुफ़्ती कासिम खड़े हो गये और आमने-सामने आ गये। १०-१२ सेकण्ड तक दोनों में शाब्दिक अभद्रता का आदान-प्रदान होता रहा। अचानक फ़राह ने अपना आपा खो दिया और मुफ़्ती कासमी पर हाथ उठा दिया, जिसके जवाब में मुफ़्ती ने एक-के-बाद-एक ‘तीन घूँसे’ फ़राह को लगाये, जो कि स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।
‘ज़ी हिन्दुस्तान’ समाचार-चैनल के संचालकों के लिए यह ‘डूब मरने’ का विषय है। उक्त घटना को बारीक़ी से समझा जाये तो सुस्पष्ट होता है कि चैनल की ओर से सूत्रधार सबीना को पूरी छूट दी गयी थी, अन्यथा एक सामान्य सूत्रधार (एंकर) की इतनी हैसियत नहीं होती कि चैनल पर लात-जूते कराये।
सूत्रधार से मेरे प्रश्न हैं— मात्र एक व्यक्ति मुफ़्ती एजाज अरशद कासमी को लक्ष्य क्यों बनाया गया था? सभी को बारी-बारी से बोलने का अवसर क्यों नहीं दिया गया था?
जब वातावरण अत्यन्त उग्र हो गया था तब कार्यक्रम समाप्त क्यों नहीं किया गया था?
बेशक, मुफ़्ती एजाज दोषी है; परन्तु सबसे बढ़कर महिला सूत्रधार सबीना अपराधी है। उच्चतम न्यायालय की अधिवक्ता फ़राह और सामाजिक कार्यकर्त्री अम्बर ज़ैदी भी दोषी है।
मुफ़्ती को १५ दिनों की न्यायिक अभिरक्षा में लिया गया है और उस पर धारा ३२३, ५०४, ५०६ तथा धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए ग़ैर-ज़मानती धारा २९५ (ए) के अन्तर्गत मुक़द्दमा क़ायम किया गया है; परन्तु उत्प्रेरक का अति निन्दनीय कृत्य करनेवाली सूत्रधार सबीना, फ़राह तथा अम्बर ज़ैदी को भी न्यायिक अभिरक्षा में लिया जाना अनिवार्य है, क्योंकि यदि वे तीनों महिलाएँ विषय-केन्द्रित रहतीं तो वैसी स्थिति नहीं आती।
इस प्रकरण की जाँच करनेवालों को उक्त कार्यक्रम की वीडियो को सुनना-देखना होगा और उसी के आधार पर जो भी दोषी सिद्ध हो/हों, उसे/उन्हें कठोर दण्ड दिये जायें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १९ जुलाई, २०१८ ईसवी)