लाखोँ छात्र-छात्राओँ के भविष्य के साथ खेलवाड़ करता सी० बी० एस० ई०!

सी० बी० एस० ई०-परीक्षाकाण्ड– एक

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

हमारे विद्यार्थियोँ, अभिभावकोँ और माता-पिताओँ ने जो सोचा नहीँ था और न ही उनकी कल्पना मे बात समा सकती थी, उसे आज देश देख रहा है। देश का शिक्षा-स्तर वैसे ही बहुत पिछड़ चुका है, उस पर परीक्षा कराने के बाद परिणाम निकलते ही सर्वत्र असंतोष और आक्रोश का वातावरण देश की शिक्षा-संस्थाओँ को अपनी चपेट और लपेट मे ले चुका है। यही कारण है कि देश की हर सड़क पर ‘अधिकार’ और ‘न्याय’ की माँग ने ज़ोर पकड़ ली है। देश का किशोर और युवावर्ग हताश और आकुल-व्याकुल दिख रहा है। “अपना दु:खड़ा किससे रोयेँ” की स्थिति मे पा रहा है।

हमने हाल ही मे ‘नीट (यू० जी०)– २०२६ मे जिस साज़िश को अंजाम देने के लिए परीक्षा से पूर्व ही प्रश्नपत्र-लीककाण्ड का उद्घाटन किया था, उससे व्याप्त असंतोष और अशान्ति का माहौल थमा ही नहीँ था कि एक और कदाचार के रूप मे सी० बी० एस० ई०– २०२६ का राज़फ़ाश हो गया है, जिसकी व्याप्ति सर्वत्र देखी जा रही है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि सी० बी० एस० ई० की ‘ऑन-लाइन स्क्रीन मार्किंग’ (ओ० एस० एम०)-प्रणाली संदिग्ध बना दी गयी है। यही कारण है कि आज लाखोँ की संख्या मे विद्यार्थी पुनर्मूल्यांकन, स्कैन प्रतिलिपि और अंकोँ के सत्यापन की माँग कर रहे हैँ, जोकि स्पष्टत: परीक्षा की प्रामाणिकता को कठघरे मे ला खड़ा करता है। विद्यार्थियोँ की शिकायत है कि बड़े पैमाने पर भुगतान-अनियमितता, अस्पष्ट स्कैन की गयीँ उत्तरपुस्तिकाएँ, उत्तरपुस्तिकाओँ मे से ग़ायब पन्ने और ग़लत उत्तर-पुस्तिकाओँ को अपलोड कर, उनके साथ क़्रूर मज़ाक़ किया गया है। दूसरी ओर, सी० बी० एस० ई० की ओर से अलग ही राग अलापा जा रहा है :– ओ० एस० एम०-प्रणाली पूर्णत: विश्वसनीय और सुरक्षित है। ऐसे मे, प्रश्न उठना वाजिब है– क्या परीक्षा कराने से पूर्व उत्तर-पुस्तिका के डिज़िटल परीक्षण की प्रणाली का सुचारु रूप से संचालन कराकर देखा गया था?

प्रथम दृष्ट्या यह एक ऐतिहासिक परीक्षा-घोटाला होता दिखने लगा है। हड़बड़ी का नतीजा दिखने लगा है :– इस बार सी० बी० एस० ई० की ९८ लाख ६० हज़ार उत्तरपुस्तिकाओँ मे से ११ लाख ३१ हज़ार उत्तरपुस्तिकाओँ के अंक-सत्यापन के लिए आवेदन किये जा चुके हैँ; आवेदन करने का सिलसिला थमा नहीँ है।ज्ञातव्य है कि सी० बी० एस० ई० की बारहवीँ की बोर्ड-परीक्षा मे देशभर से जितनी छात्र-छात्राओँ ने परीक्षा दी थी, उनमे से एक-चौथाई से अधिक छात्र-छात्राओँ ने अपनी उत्तरपुस्तिकाओँ के परीक्षण और अंक देने के तरीक़े पर संदेह ज़ाहिर करते हुए, पुनर्मूल्यांकन और स्कैन-प्रति की माँग कर डाली है। परिवादकर्त्ता-कर्त्रियोँ की संख्या इतनी बड़ी हो चुकी है कि सी० बी० एस० ई० का पोर्टल बार-बार निष्क्रिय होता दिख रहा है। ओ० एस० एम०-प्रणाली का क्रियान्वयन् अब सी० बी० एस० ई० के लिए ”गले की हड्डी” बन चुका है। परिवादियोँ का कहना है कि उक्त पद्धति के चलते, उन्हेँ अपेक्षाकृत बहुत कम अंक दिये गये हैँ।

ओ० एस० एम०-प्रणाली क्या है?

इसका पूर्ण रूप है– ‘ऑन-लाइन स्क्रीन मार्किंग’। यह एक प्रकार का ‘डिज़िटल वैलुएशन सिस्टम’ (डी० ह्वी० एस०) है, जिसके अन्तर्गत पहले उत्तरपुस्तिका को स्कैन किया जाता है, फिर कम्प्यूटर-पटल पर उसका परीक्षण किया जाता है। इस प्रक्रिया मे सर्वप्रथम उत्तरपर्णी (आँसर-शीट) को अति तीव्र गतिवाले स्कैनर से स्कैन करके उसे डिज़िटल फॉर्मेट (पी० डी० एफ० वा इमेज मे बदला जाता है। जिन उत्तरपुस्तिकाओँ की स्कैनिंग की जा चुकी रहती है, उन्हेँ ‘सिक्योरिटी सॉफ़्टवेअर’ पर अपलोड किया जाता है। उसके पश्चात् जो परीक्षक उत्तरपुस्तिका का परीक्षण कर रहे होते हैँ, उत्तरपुस्तिका को लैपटॉप वा टैबलेट पर लॉग-इन करके पटल (स्क्रीन) पर ही उत्तर देखते हुए, डिज़िटल लेखनी वा माउस के ज़रिये अंक देते हैँ। इस प्रणाली से अंक का योग भी कर लिया जाता है।

उक्त शैक्षणिक केन्द्र की ओर से दावा भी किया गया है कि इस प्रणाली से कुल प्राप्तांक का योग त्रुटिरहित होता है। अब इस कथित डिज़िटल-प्रणाली पर भी अँगुलियाँ उठायी जाने लगी हैँ। ज्ञात हुआ है कि परीक्षकोँ ने आरम्भ मे उत्तरपर्णी के अस्पष्ट (ब्लर) होने और प्रौद्योगिकी (तकनीकी)-कठिनाई को लेकर शिकायतेँ की थीँ; केन्द्रीय विद्यालयोँ के शिक्षक-संघ की ओर से यह सुस्पष्ट कर दिया गया था कि विवादित प्रणाली 'ओ० एस० एम०'-संचालन-हेतु शिक्षकोँ का समुचित प्रशिक्षण नहीँ कराया गया है; परन्तु प्रबन्धन की ओर से ये शिकायतेँ दर-किनार कर दी गयी थीँ, जिसका परिणाम रहा कि अस्पष्ट दिख रहीँ उत्तरपुस्तिकाओँ का परीक्षण किये बिना ही एक अनुमान के आधार पर अंक दे दिये गये हैँ। इस प्रमाद के कारण जो विद्यार्थी मेधावी हैँ, उनके भविष्य के साथ न्याय नहीँ किया गया है; "सब धान बाईस पसेरी'' को चरितार्थ कर दिया गया है।

यहाँ प्रश्न है– ओ० एस० एम० को बिना सोचे-समझे लागू करने की इतनी शीघ्रता क्योँ थी? जिस तरह से 'मॉक इण्टरव्यू'/'प्रदर्शन' कराये जाते हैँ उसी तरह से उस प्रणाली को एक 'पॉयलेट प्रोजेक्ट' के रूप मे किसी सामान्य स्तर (बिना बोर्ड-परीक्षावाली) वाली कक्षा मे लागू कराकर उसकी विश्वसनीयता को क्योँ नहीँ परखा गया था? सच तो यह है कि यह एक प्रकार से 'तुगलकी निर्णय' साबित हुआ है।
  
ओ० एस० एम० की विश्वसनीयता तब तार-तार हो गयी जब बारहवीँ के विद्यार्थी वेदान्त श्रीवास्तव ने अपनी उत्तरपुस्तिका की स्कैण्ड प्रतिलिपि के लिए आवेदन किया था, फिर उसे जो उत्तरपुस्तिका दी गयी थी, उसे लेकर उसने अपनी उत्तरपुस्तिका न होने की पुन: शिकायत कर डाली। उस विद्यार्थी की शिकायत उसके लिए इतनी भारी पड़ गयी कि 'मुक्त मीडिया' (सोसल मीडिया) पर उसके विरुद्ध अभद्र शब्द प्रयोग किये जाने लगे। दूरदर्शन, दिल्ली का एकर अशोक श्रीवास्तव ने बढ़-चढ़कर 'वाचाली' करते हुए, उस विद्यार्थी को 'पाकिस्तानी' तक कह डाला। जब वेदान्त की शिकायत पर ग़ौर किया गया तब उसकी बात सच निकली। वास्तव मे, उसे जो उत्तरपुस्तिका दी गयी थी, वह किसी और की थी। जब उसे उसकी उत्तरपुस्तिका दी गयी थी तब उसमे अनेक अनियमितता थी। पुनर्मूल्यांकन करने पर उसके अंक दहाई मे बढ़ाने पड़े थे। सी० बी० एस० ई० ने अपनी ग़लती मानी और जो नितान्त असभ्य सरकारी एंकर अशोक श्रीवास्तव है, उसे अपनी प्रतिक्रिया हटाकर मुँह की खानी पड़ी। यहाँ यह विषय प्रमुख है कि दूरदर्शन, दिल्ली मे समाचार सुनानेवाला एक स्थायी कर्मचारी को वैधानिक अधिकार है कि वह ऐसे विषय पर मुँह मारे। इससे पहले भी वह अन्य विषयोँ पर अभद्र प्रतिक्रिया कर, अपने असभ्य संस्कार को खुले आम कर चुका है। वेदान्त की शिकायत पर सी० बी० एस० ई० के छद्म प्रवक्ता बनते हुए, कथित वाग्मी अशोक श्रीवास्तव ने ट्वीट कर दिया था, "क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?!!🤕🤕🤕" यद्यपि वह दूरदर्शन, दिल्ली मे हिन्दी-समाचार पढ़ता है और एंकरिंग करता है तथापि उसमे भाषा-शुचिता और संस्कार है ही नहीँ; उसका यह वाक्य भी अशुद्ध है। जब परिणाम वेदान्त के पक्ष मे आया तो उस एंकर को थूककर चाटना पड़ा। उसने अपने ट्वीट को हटाया और सार्वजनिक रूप से मुआफ़ी माँगी थी। इसी तरह से उसने विपक्षी नेता राहुल गांधी के लिए भी अपशब्द कहा था; वहाँ भी उसे मुआफ़ी माँगनी पड़ी थी। देश की जनता उसे 'मुआफ़ी-वीर' कहने लगी है।

    वेदान्त श्रीवास्तव का प्रकरण सुलझा ही था कि गीता मोज़ा नामक महिला ने सी० बी० एस० ई० की कार्यप्रणाली पर ऐसे-ऐसे सवालात दाग़ दिये कि उस संस्था को नीद नहीँ आ रही है। गीता ने 'एक्स' एकाउण्ट/ट्वीटर अपना स्वाभाविक आक्रोश व्यक्त करते हुए, सी० बी० एस० ई० को आरोपित किया है:– मैने अपनी बेटी की चार विषयोँ की स्कैन की गयी उत्तरपुस्तिकाएँ देखीँ तब हतप्रभ रह गयी :– एक विषय की उत्तरपुस्तिका से 'पृष्ठसंख्या २२' पूरी तरह से ग़ायब है; हद तो तब हो गयी जब कई विषयोँ मे छात्रा के उत्तर अधिकृत उत्तरपर्णी से पूरी तरह से मिल रहे थे; बावुजूद अंक नहीँ दिये गये। अन्त मे जब गीता मोज़ा की पुत्री को वास्तविक उत्तरपुस्तिका दी गयी थी तब उसमे ३० अंक दिये ही नहीँ गये थे।

यहाँ बारहवीँ कक्षा के विद्यार्थियोँ के लिए २५-३० अंक बहुत महत्त्व के होते हैँ; क्योँकि उनका समूचा भविष्य और प्रवेश-प्रक्रिया इन्हीँ अंकोँ पर निर्भर करती है। बेशक, यह लाखोँ विद्यार्थियोँ के भविष्य के साथ निर्मम और अक्षम्य कृत्य है।

(क्रमश:)