मिले जो कोई भी मझधार,
कहो फिर कैसे बिन पतवार,
चलूँ किस डगर, बता किस नगर,
न कोई ओर न कोई छोर।
नचावे प्रतिदिन यह चितचोर,
छोड़ कर इस दुनिया की होड़,
मची है जहाँ वो अंधी दौड़,
कि बस मैं रहूं व मैं ही बढूं।
तो मैं अब बढ़ू भला किस ओर,
भला किस प्रहर,
कौन सी सहर,
या यूँ ही रहूं मैं कुछ पल ठहर।
तलछठ तक देख चुकी कब की,
इस से बढ़कर विस्तार है क्या,
जब स्पंदन ही अब छोड़ दिया,
तो जीत है क्या और हार है क्या?
जब जीवन का हर राग,
अंततः किया है अंगीकार,
किया जब स्वयं ही है स्वीकार,
करूँ किस से फिर मैं तकरार।
दिखाऊं किस पर फिर मैं रोष,
बताओ किसका दे दूँ दोष,
नहीं जब रहा मुझे ही होश,
कहूं फिर किसे यह आक्रोश।
पर मझधार भी तो ठहरती नहीं,
वो बहती है, मुझे भी बहाती है।
जब पतवार टूटी, तो समझ आया
नदी को दिशा नहीं, समर्पण चाहिए।
अब न कोई ओर बचा, न कोई छोर,
बस मैं हूँ, और बहाव है।
जिस ओर ले जाए यह धार,
उसी को अपना घर मान लिया।
न बढ़ना बाकी रहा, न रुकना,
बस बहने में ही मुक्ति मिल गई।
जब ‘मैं’ मिटा, तो मझधार भी मिट गई और
रह गई बस एक शांत सरिता,
जो सागर में समा जाने को तैयार है।