उन्हेँ औक़ात पे अब लाइए साहिब!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

उनकी बातोँ मे मत आइए साहिब!
उनके घातोँ मे मत आइए साहिब !
हर गोट के मिज़ाज से वाक़िफ़ हैँ वे,
भूलकर भी धोखा मत खाइए साहिब!
ख़ैरात भी माँगेँ तो मत दीजिए कभी,
उन्हेँ औक़ात पे अब लाइए साहिब!
फ़रेब का बाज़ार सजता है सलीक़े से,
आप भी तशरीफ़ ले आइए साहिब!
दिन के अँधेरे मे चेहरे रौशन नहीँ होते,
रात के उजाले मे उन्हेँ पाइए साहिब!
बेदर्द ज़माने की करते हैँ नुमाइन्दगी,
भूले से भी तरस मत खाइए साहिब!
दरिन्दगी मे अव्वल हैँ जान लीजिए,
चेहरे की मुसकान पे मत जाइए साहिब!
कथनी-करनी का संगम मत पूछिए कभी,
फ़र्क़ ज़मीँ-आस्माँ का पाइए साहिब!
मुल्क भी बेचैन है शतरंजी चाल से,
ग़म पीजिए औ’ ग़ुस्सा भी खाइए साहिब!
वो क़त्ल भी करते हैँ क़रीने से बहुत,
एहतिराम से आप पहुँच जाइए साहिब!
चित औ’ पट्ट भी उनकी है बनी रहती,
सोच के हैरत मे मत आइए साहिब!
देह की रग-रग भी बूढ़ी हो रही यहाँ,
कहीँ से कोई तदबीर लाइए साहिब!
बूढ़ी जम्हूरियत लहूलुहान हो रही कबसे,
रौँदते हैँ पैर बेरहम, बचाइए साहिब!


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