प्रतीक्षा कहूँ…
या कहूँ प्रतीक्षाएँ,
अनवरत जीवनपर्यंत।
प्रतीक्षा एक मुकाम की,
प्रतीक्षा सम्मान की,
निज आन के अभिमान की,
निर्णयों की स्वतंत्रता की,
प्रिय के मान की।
उन्मुक्त गगन में उड़ान की,
हाँ, है कुछ,
मुझमें इप्सित,
प्रतीक्षित,
बहु प्रतीक्षित………
प्रतीक्षा है उस सुबह की,
जब अंधेरा स्वयं कहे — अब जा,
प्रतीक्षा है उस दीप की,
जो मेरे भीतर धीरे-धीरे जगे।
प्रतीक्षा है उस मौन की,
जिसमें शब्द बिना बोले समझ आएँ,
प्रतीक्षा है उस स्पर्श की,
जो घावों को भी गीत बना जाएँ।
प्रतीक्षा है स्वयं से मिलने की,
जब मैं, मैं होकर रह जाऊँ,
न कोई शर्त, न कोई बंधन,
बस मैं और मेरी गहराई रह जाएँ।
शायद यही जीवन है —
प्रतीक्षा करते-करते,
प्रतीक्षा ही बन जाना।