प्रयागराज। पं० जवाहरलाल नेहरू एक ऐसा व्यक्तित्व था, जिसमे राजनीति, क्रान्ति, इतिहास, भूगोल, विज्ञान एवं सार्वकालिक विषयोँ का ज्ञान भरा हुआ था। उन्होँने अभाव देखा और अनुभव किया था तथा सभाव को भी जिया था। यही अन्तर्विरोध जवाहर को ‘जवाहर’ बनाता था। वे स्वच्छन्द व्यक्तित्व के स्वामी थे। देश अँगरेज़ोँ के अधीन बना रहा, जिसकी छटपटाहट भी महसूस की थी। देशप्रियता और राष्ट्रभक्ति का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि उन्होँने देश को आज़ाद कराने के प्रयास मे अँगरेज़ी सरकार से लोहा लेते हुए, लगभग नौ वर्ष जेल मे ही बिताये थे; चहलक़दमी करना, दौड़ना, सूत कातना और पढ़ना-लिखना उनके जेल-जीवन की दिनचर्या मे शामिल थे; वे डिगे नहीँ। अहमदनगर की जेल ने उन्हेँ ‘ऐतिहासिक’ पुरुष बना दिया, जब उन्होँने जेल-जीवन जीते हुए ‘डिस्कवरी ऑव़ इण्डिया’ (भारत : एक खोज) का प्रणयन किया था।
पं० नेहरू की पुण्यस्मृति मे ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से २७ मई को ‘सारस्वत सदन’ आलोपीबाग़, प्रयागराज मे एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था, जिसका विषय था, ‘पं० जवाहरलाल नेहरू : दृष्टि और सृष्टि’।
आयोजन का प्रारम्भ आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने एक पं० नेहरू की राष्ट्रप्रियता और दानशीलता को रेखांकित करनेवाले संस्मरण से किया। आचार्य ने सुनाया– अल्फ्रेड पार्क (कम्पनी गार्डन), इलाहाबाद मे अँगरेज़ी सरकार की पुलिस और चन्द्रशेखर आज़ाद के बीच मुठभेड़ हो गयी थी। दोनो ओर से गोलियाँ चलायी जा रही थीँ। क्रान्तिकारी आज़ाद को चारोँ ओर से घेर लिया गया था; बचने की कोई उम्मीद नहीँ थी। अँगरेज़ी हुक़ूमत उनके शरीर को ‘जीते-जी’ छू न सके, यह सोचकर उन्होँने अपनी कनपटी पर अपनी ‘माउज़र’ पिस्टल सटाकर गोली चला दी। वे वीरगति को प्राप्त कर चुके थे, फिर भी अँगरेज़ी पुलिस मे साहस नहीँ था कि वे शव के समीप जा सकेँ। अन्तत:, जब विश्वास हो गया कि आज़ाद चिर-निद्रा मे लीन हो गये हैँ तब उनके जेब की तलाशी ली गयी थी। जेब मे ५०० रुपये मिले थे। वे वही रुपये थे, जिसे पं० जवाहरलाल नेहरू ने क्रान्तिकारी यशपाल को दिये थे। हुआ योँकि यशपाल और कुछ अन्य क्रान्तिकारियोँ को सोवियत संघ जाना था। यशपाल पं० नेहरू से मिले, फिर उनसे १,५०० रुपये की आर्थिक सहायता माँगी थी। पं० नेहरू ने दो दिनो के बाद अपने एक विश्वस्त कर्मचारी से यशपाल के पास रुपये भेजवा दिये थे, यद्यपि उन दिनो पं० नेहरू आर्थिक तंगी से गुज़र रहे थे; क्योँकि पं० मोतीलाल नेहरू और वे स्वयं वकालत छोड़ चुके थे, जो कुछ जमा-पूँजी थी, उसी से जीवन-यापन कर रहे थे। यशपाल ने पं० नेहरू-द्वारा दिये गये १,५०० मे से ५०० आज़ाद की जेब मे डाल दिये; ५०० दूसरे क्रान्तिकारी मित्र को दिये और शेष ५०० अपने पास रखे थे। यशपाल ने इस घटना का उल्लेख अपनी आत्मकथा ‘सिंहावलोकन’ मे किया है।
मेरठ से डॉ० अंजली पटवा ने कहा– पं० नेहरू का व्यक्तित्व सर्वोपरि था। उनका चिन्तन-धरातल बन्धनरहित था। उनके लिए सबसे पहले देश था।
शिलांग से प्रो० विनय शुक्ल ने कहा– हम धन्य हैँ कि हमे पं० नेहरू-जैसा एक ऐसा महान शख़्सीयत मिला, जिसने अपना सुख-त्यागकर पराधीन भारत को स्वाधीन कराने मे अपना जीवन अर्पित कर दिया।
इनके अतिरिक्त ग्वालियर से अर्चना जाटव, मुंगेर से अर्पण झा, सिकन्दराबाद से मयंक श्रोतीय, औरंगाबाद से डा० फ़ाजिल अहमद इत्यादिक की सहभागिता रही।