विजय कुमार (अजुहा, कौशांबी)
जानते हैं हमारा देश पिछले साठ सालों मे क्यों पिछड़ता गया क्योंकि पिछली सरकारों ने राज करने के लिए सबसे आसान एजेंडे मुफ्तखोरी को बढ़ावा दिया और यह धीरे-धीरे हमारी मानसिकता और डी.एन.ए. मे यह समाहित हो गया। सरकारों को सबसे आसान तरीका अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए यही सूझा जिसका खामियाजा समाज के उन दबे-कुचले लोगों को ही उठाना पड़ा जिनके उत्थान के लिए सरकारों ने बहुत सी कल्याणकारी योजनाएं भी चलाई।
धीरे धीरे समाज में लूटखोरी बढ़ती गयी । लोगों का लालच इतना सिर चढ़कर बोलने लगा कि वे एकप्रकार से इसे लूटने पर आमादा हो गये और एक समय ऐसा भी आ गया कि जो इन योजनाओं के वास्तविक हकदार थे भले ही वे उसे प्राप्त करने मे पीछे रह गये । लेकिन जिन्हे इसकी जरूरत भी नहीं थी वह इसे प्राप्त करने मे सबसे अगली कतार मे पहुंच गये और अपनी हैसियत, प्रभाव व धन के बल पर गरीबों के हक पर अधिकार प्राप्त कर लिया । इसी से भ्रष्टाचार को भी काफी हद तक बढ़ावा मिला। लोगों के लालच मे अंधे हो जाने के कारण उनका नैतिक पतन हो गया। उन्हे जरा भी शर्म या हिचक नहीं महसूस हुई कि यह सब किसके लिए है ? आज भी यही स्थिति बहुतायत में है क्योंकि भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ चुका है कि पैसे के बल पर अपात्र लोग पात्रों का हक मार रहे हैं और पात्र वहीं का वहीं भटकते हुए सिसकियां ले रहा है । अपनी बारी की आशा मे टकटकी लगाए जिंदगी खपा रहा है। कितना वीभत्स एवं दुःखदायी स्वरूप है समाज का, सोचकर ही अपार पीड़ा का अनुभव होता है।
बहुत से तो ऐसे लोग हैं जो पूरी तरह अपात्र होते हुए भी बड़ी शान से इन योजनाओं पर अपना अधिकार समझते हैं, कितने ब़ेशर्म हो गये हैं लोग कि नैतिकता नाम की चीज तक नही शेष बची लोगों के भीतर ? ऐसे लोग स्वयं इतने संपन्न हैं कि स्वयं लोगों का सहारा बन सकते हैं लेकिन समाज के अपने ही शोषित, वंचित असहाय भाईयों की बैसाखी को भी लूटने मे भी रंचमात्र न संकोच है और न अफसोस।