डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
संध्या का समय था। आकाश में सूर्य धीरे-धीरे अस्त हो रहा था, और उसकी किरणें आकाश को लालिमा से भर रही थीं—मानो प्रकृति स्वयं किसी गहन भाव से रंग गई हो। हवेली के पीछे वही उपवन… पीपल का वृक्ष शांत खड़ा था।
सुधांशु वहीं खड़ा था, और उसके सामने माधवी। दोनों के बीच मौन था—पर वह मौन शब्दों से कहीं अधिक मुखर था।
माधवी ने सबसे पहले मौन को तोड़ा। उसका स्वर धीमा था, पर भीतर एक गहरी वेदना छिपी थी—
आप बदल गए हैं, सुधांशु! सुधांशु ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में करुणा थी, पर साथ ही एक गहरी स्थिरता भी। “परिवर्तन ही जीवन का स्वभाव है, माधवी।”
माधवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा— पर हर परिवर्तन सुखद नहीं होता। वह कुछ क्षण रुकी, फिर बोली— पहले आपके शब्दों में अपनापन था… अब उनमें वैराग्य है।
सुधांशु के भीतर एक हल्का कंपन हुआ। यह वही प्रश्न था जिससे वह स्वयं भी जूझ रहा था।
उसने शांत स्वर में कहा— “वैराग्य अपनापन का विरोधी नहीं है, माधवी… वह तो उसे और शुद्ध करता है।”
माधवी ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा— “क्या शुद्धता का अर्थ दूरी है?”
यह प्रश्न सरल था, किन्तु उसके भीतर एक गहरी पीड़ा थी।
सुधांशु कुछ क्षण मौन रहा। फिर धीरे से बोला— “यदि दूरी से प्रेम कम हो जाए… तो वह प्रेम नहीं, आसक्ति है।”
माधवी की आँखों में आँसू आ गए। “तो क्या हमारा प्रेम… आसक्ति था?” उसका स्वर काँप रहा था। सुधांशु के लिए यह क्षण अत्यंत कठिन था। उसने एक कदम आगे बढ़कर कहा “नहीं, माधवी… हमारा प्रेम सच्चा है।” “तो फिर यह दूरी क्यों?” उसने तुरंत पूछा।
सुधांशु ने गहरी साँस ली। “क्योंकि अब मैं समझने लगा हूँ कि प्रेम का अर्थ किसी को अपने पास रखना नहीं… बल्कि उसे उसके सत्य तक पहुँचने देना है।”
माधवी ने यह सुनकर आँखें बंद कर लीं। कुछ क्षण तक वह मौन रही।फिर धीरे से बोली— और यदि मेरा सत्य… आपके साथ होना हो तो?
यह प्रश्न सुधांशु के भीतर जैसे तूफान बन गया। उसके मन में अनिरुद्ध के शब्द गूँजने लगे— प्रेम मुक्त करता है… आसक्ति बाँधती है।
उसे मंदिर का वह अनुभव याद आया— वह शून्य… वह एकत्व… और उसी क्षण उसे यह समझ आया— प्रेम को किसी निर्णय में बाँधा नहीं जा सकता।
उसने बहुत शांत स्वर में कहा— “यदि हमारा साथ होना सत्य होगा तो कोई भी शक्ति हमें अलग नहीं कर पाएगी। तभी माधवी ने पूछा और यदि नहीं हुआ?
सुधांशु ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “तो हमें उसे स्वीकार करना होगा… बिना किसी शिकायत के।”
माधवी के आँसू अब बहने लगे थे। किन्तु इस बार उनमें केवल दुःख नहीं था— एक गहरी समझ भी थी। उसने धीरे से कहा— “आप बदल गए हैं… पर शायद मैं भी बदल रही हूँ।”
वह कुछ क्षण रुकी। फिर उसने बहुत गहरे स्वर में कहा “मैंने हमेशा आपको अपने जीवन का आधार माना… पर आज पहली बार मुझे लग रहा है कि शायद प्रेम का अर्थ यह नहीं है कि हम किसी को अपना बना लें…” उसने आँसू पोंछे।
“शायद प्रेम का अर्थ यह है कि हम किसी को उसकी पूर्णता तक पहुँचने दें।”
सुधांशु की आँखों में अब करुणा के साथ-साथ एक संतोष भी था।
यह वही बोध था जिसकी ओर वह स्वयं बढ़ रहा था और अब माधवी भी उसी दिशा में कदम रख रही थी।
उसी समय दूर खड़ा अनिरुद्ध यह सब देख रहा था। उसके चेहरे पर एक गहरी मुस्कान थी।
वह धीरे से बोला— अब यह प्रेम आसक्ति से मुक्त होकर भक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। उपवन में अब अंधकार उतरने लगा था। किन्तु उस अंधकार के भीतर एक नया प्रकाश जन्म ले चुका था। समझ का प्रकाश… स्वीकृति का प्रकाश… और सबसे बढ़कर—निस्वार्थ प्रेम का प्रकाश।
माधवी ने धीरे से कहा कि “सुधांशु… यदि मैं आपके साथ न भी रहूँ… तो क्या आप मुझे कभी भूल जाएँगे?”
सुधांशु ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“जो प्रेम स्मृति पर आधारित हो, वह सच्चा नहीं होता। सच्चा प्रेम तो वह है जो अस्तित्व का हिस्सा बन जाए।”
यह सुनकर माधवी ने पहली बार मुस्कराया। उस मुस्कान में अब पीड़ा कम थी… और शांति अधिक।
उस क्षण दोनों के बीच कोई बंधन नहीं था और फिर भी एक गहरा संबंध था। यह थी प्रेम की अग्निपरीक्षा जहाँ प्रेम ने स्वयं को खोकर अपने वास्तविक स्वरूप को पा लिया।