इन दिनो निजी शिक्षण-संस्थाओँ मे मनमाने तरीक़े से शुल्क-वृद्धि, पुस्तक, उत्तरपुस्तिकाओँ, गणवेश (यूनिफ़ार्म) आदिक के मूल्योँ मे जिस तरह से अप्रत्याशित वृद्धि की जा रही है; साथ ही यह बाध्यता कि उपर्युक्त सामग्री सम्बन्धित शिक्षण-संस्थाओँ से ही क्रय करनी होगी– यह बताती है कि निजी शिक्षण-संस्थाएँ ज्ञान का मन्दिर नहीँ, अपितु धन्धा का माध्यम बना दी गयी हैँ। आश्चर्य है! इस अन्यायपूर्ण कृत्य के विरुद्ध काररवाई कराने मे सम्बन्धित राज्य की सरकारेँ और ज़िला-प्रशासन विफल रहे हैँ वा योँ कहेँ, उनकी कोई रुचि नहीँ रही है, जिसके कारण निजी शिक्षण-संस्थान चलानेवाले बहुसंख्य प्रबन्धक अनियन्त्रित हो चुके हैँ। हमे ऐसे शिक्षण-संस्थाओँ की मनमानी रोकने के लिए कौन-से ठोस उपाय करने होँगे? इस प्रश्न पर विचार करने के लिए ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे बलिया और प्रयागराज से एकसाथ एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था, जिसमे कई प्रबुद्धजन की सहभागिता रही।
नोएडा से वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक सुनील श्रीवास्तव ने बताया– मेरी राय मे निजी शिक्षण-संस्थाओँ की स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध अविभावकोँ को संघटित होकर आवाज़ उठानी होगी, जिससे कि सरकार की कई दशक से बन्द आँखेँ खुल जायेँ।निस्संदेह, इस तरफ़ से सरकार का निष्क्रिय रहना और दिखना अत्यन्त दु:खद स्थिति है, जो शिक्षा की दशा और दिशा को प्रश्नो के कठघरे मे खड़ा करती है।
बलिया से श्री मुरलीमनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय मे हिन्दी-आचार्य प्रो० जैनेन्द्रकुमार पाण्डेय ने बताया– मुझे लगता है, इसके लिए हमे मिलजुलकर प्रयास करने होँगे। सरकारोँ को शिक्षा के प्रति गम्भीर होना होगा। सरकारी शिक्षण-संस्थाओँ को फिर से उत्कृष्ट शिक्षा-केन्द्र के रूप मे विकसित करना होगा, ताकि अभिभावक अपने बच्चोँ को बेझिझक वहाँ भेज सकेँ। सरकारी संस्थानो की जवाबदेही होती है, इसलिए वे बेलगाम नहीँ हो सकते। इसके साथ ही अभिभावकोँ की जागरूकता इस समस्या पर लगाम लगाने मे काफ़ी हद तक मददगार साबित हो सकती है। अभिभावक इस समस्या को नेताओँ, समर्थ अधिकारियोँ और हितधारकोँ के समक्ष मज़्बूती से उठाकर उन्हेँ इस दिशा में प्रभावी काररवाई करने को मज़्बूर कर सकते हैं। लोकतन्त्र मे आम आदमी की आवाज़ बहुत देर तक दबायी नहीँ जा सकती, इस सच्चाई से वाक़िफ़ लोग को लगातार आवाज़ उठाते रहना चाहिए।
प्रयागराज से शिक्षाविद् डी० के० सिँह ने कहा– प्रश्न है– आख़िर हम निजी शिक्षण-संस्थाओँ की शरण मे जाते ही क्योँ हैं, जबकि विभिन्न सुविधाओँ के साथ सस्ते मे सरकारी शिक्षण-संस्थाएँ उपलब्ध है? इसका कारण शायद शिक्षण की गुणवत्ता का प्रश्न है, जो सरकारी मे योग्य शिक्षकोँ के अभाव मे उपलब्ध नहीँ हो पाती, जिसका मुख्य कारक ‘आरक्षण’ है। हमे चाहिए कि निजी का रोना छोड़कर, सरकार से सरकारी विद्यालयोँ मे बिना आरक्षण के केवल उच्च स्तरीय शिक्षकोँ की नियुक्ति के लिए पुरजोर अपील करेँ, तभी अतिरिक्त भार से मुक्ति सम्भव है।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– निजी शिक्षण-संस्थाओँ की मनमानी रोकने के लिए देश के प्रत्येक ज़िला मे एक अभिभावक-संघटन होना चाहिए, जिसका एक केन्द्रीय कार्यालय हो और शेष शाखाएँ। राज्य-सरकारेँ अपने प्रशासनतन्त्र को कठोर निर्देश करेँ कि निजी शिक्षण-संस्थाएँ एक उचित अनुपात मे शुल्क का निर्धारण करेँ और उसमे मनमाने ढंग से वृद्धि न करेँ। अभिभावक वा मातापिता गणवेश, पुस्तकेँ, अभ्यासपुस्तकेँ कहीँ से भी क्रय करने के लिए स्वतन्त्र रहेँ। गणवेश प्रतिवर्ष एक-जैसा ही रहे; उसमे बदलाव न होता रहे। निजी शिक्षण-संस्थाओँ की गतिविधियोँ का प्रतिवर्ष निरीक्षण और सम्परीक्षण करने के लिए राज्य-सरकारोँ की ओर से एक सम्परीक्षक-मण्डल का गठन हो।
सुखपुरा, बलिया (उत्तरप्रदेश) से गृहिणी रश्मि यादव ने बताया– राज्य-सरकारेँ यदि सरकारी स्कूलोँ मे बच्चोँ को भर्ती कराने का एक ज़ोरदार अभियान शुरू कर दे और शहर और देहातोँ मे जगह-जगह बढ़िया तरीक़े के स्कूल खोलने की शुरूआत कर दे तो इससे निजी स्कूलोँ के प्रति आकर्षण कम हो सकता है। अधिकतर निजी स्कूलवाले पढ़ाई के नाम पर धन्धा कर रहे हैँ।
पुणे (महाराष्ट्र) से साहित्यशिल्पी एवं शिक्षाविद् डॉ० ममता जैन ने कहा– इसके लिए आवश्यक है कि शासन शक्त एवं पारदर्शी नीतियाँ बनाकर इन संस्थाओं की मनमानी पर अंकुश लगाये। शुल्क-निर्धारण की स्पष्ट व्यवस्था हो; अनावश्यक बन्धन समाप्त किये जायेँ तथा अभिभावकोँ की शिकायतोँ के त्वरित निवारण की सुदृढ़ प्रणाली विकसित की जाये। इसके साथ ही, समाज को भी सजग रहकर अपने अधिकारोँ और कर्त्तव्योँ को समझना होगा। शिक्षा को पुनः सेवा, समर्पण और राष्ट्र-निर्माण का आधार बनाना ही समय की माँग है, ताकि यह व्यापार नहीं, बल्कि संस्कार और समता का सुदृढ़ माध्यम बन सके।
दरभंगा (बिहार) से साहित्यकार एवं ज्योतिर्विद् आदित्यमोहन झा ने बताया– वर्तमान मे, निजी शिक्षण-संस्थाओँ को व्यापार का केन्द्र बनने से रोकने के लिए सरकार को इन बिन्दुओँ पर कार्य करना चाहिए :– १– अभिभावक किसी पुस्तक विक्रेता से पुस्तक क्रय कर सकता है। २– प्रकाशकोँ-द्वारा पुस्तकमूल्य-निर्धारण मे एक सीमा सुनिश्चित की जाये। ३–-गणवेश का प्रारूप अभिभावकोँ को दिया जाये, जिससे वे स्वतन्त्रतापूर्वक निर्धारित गणवेश कहीँ से भी क्रय कर सकेँ वा सिलवा सकेँ। ४– विद्यालय-द्वारा लिये जानेवाले शुल्क की अधिकतम सीमा का निर्धारण किया जाना चाहिए। यदि उपर्युक्त नियमो के पालन मे किसी तरह की लापरवाही हो तो आर्थिक दण्ड के साथ और भी यथायोग्य कठोरतम दण्ड का प्रविधान किया जाना चाहिए।
इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय मे वनस्पतिविज्ञान की शोधच्छात्रा चकोरी शुक्ल ने कहा– जनसाधारण के हाथोँ की सबसे ताकतवर कुंजी है, आर० टी० आई०, जिसका उपयोग कर हम निजी शिक्षण-संस्थाओँ मे समय-समय पर हो रहे विभिन्न बदलावोँ का कारण ज्ञात कर सकते हैँ। प्रश्न करना, इस बात का प्रतीक है कि हम आँखेँ मूँदकर इन बदलावोँ का साथ नहीँ देँगे। समय-समय पर हो रही शुल्कवृद्धि एवं किताबोँ का निजीकरण जनसामान्य के मूल अधिकारोँ का हनन है।
