ब्राह्मण, जाति और समाज

मानव समाज की एक जटिल सच्चाई यह है कि संसार का कोई भी देश, कोई भी संस्कृति, कोई भी मत या सम्प्रदाय ऐसा नहीं है जहाँ किसी न किसी रूप में श्रेष्ठताबोध अर्थात् ऊँच-नीच की भावना—का अस्तित्व न हो। यह श्रेष्ठताबोध कई बार जाति के रूप में, कई बार वर्ग के रूप में, तो कई बार रंग, नस्ल, आर्थिक स्थिति या सांस्कृतिक पहचान के आधार पर प्रकट होता है। नाम और स्वरूप भले ही बदलते रहें, किन्तु उसका मूल भाव लगभग एक ही रहता है—अपने को दूसरों से श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति।

भारतीय समाज में यह प्रश्न अक्सर उठाया जाता है कि क्या जाति-व्यवस्था केवल यहीं की देन है, और क्या इसका निर्माण किसी एक वर्ग, विशेषतः ब्राह्मणों ने किया? यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, उसका उत्तर उतना ही जटिल है। यदि हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो स्पष्ट होता है कि जाति जैसी संरचनाएँ केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। यूरोप में मध्यकालीन वर्ग-व्यवस्था, अमेरिका में नस्लीय भेदभाव, अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में जनजातीय विभाजन—ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि मानव समाज स्वाभाविक रूप से वर्गीकरण और भेद की ओर झुकता रहा है।

ऐसे में यह कहना कि जाति-व्यवस्था केवल ब्राह्मणों द्वारा निर्मित एक षड्यंत्र है, एक सरलीकृत और अधूरा दृष्टिकोण प्रतीत होता है। यह उसी प्रकार है जैसे किसी कथा में मूल समस्या को समझे बिना किसी एक पात्र को दोषी ठहरा देना। यह प्रसंग हमें मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ठाकुर का कुआँ की याद दिलाता है, जहाँ पीड़ित वर्ग अपने लिए नया समाधान खोजने के बजाय उसी व्यवस्था के भीतर संघर्ष करता रहता है। इस दृष्टान्त का तात्पर्य यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए, बल्कि यह कि समस्या की जड़ को समझे बिना केवल आरोप-प्रत्यारोप से समाधान नहीं निकलता।

यह भी सत्य है कि भारतीय समाज में ब्राह्मण वर्ग ऐतिहासिक रूप से ज्ञान और बुद्धिबल के कारण सामाजिक संरचना के केंद्र में रहा है। ज्ञान के कारण ही उसे मार्गदर्शक की भूमिका मिली। किन्तु इसी के साथ उस पर एक नैतिक उत्तरदायित्व भी था—समाज को संतुलित रखना, शोषण से बचाना और न्याय की स्थापना करना। यदि कहीं यह उत्तरदायित्त्व निभाया नहीं गया, तो उसकी आलोचना भी उतनी ही आवश्यक है। परन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि इतिहास एकरंगी नहीं होता; उसमें अच्छाइयाँ और त्रुटियाँ दोनों साथ-साथ चलती हैं।

भारतीय परम्परा में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि मूलतः ज्ञान और गुण को जन्म से ऊपर रखा गया। छांदोग्य उपनिषद में वर्णित सत्यकाम जाबालि का प्रसंग इसका सशक्त उदाहरण है। सत्यकाम, जिनकी माता एक दासी थीं, उन्हें उनके सत्य और जिज्ञासा के कारण एक महान गुरु ने स्वीकार किया और वे आगे चलकर एक प्रतिष्ठित ऋषि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि आदर्श व्यवस्था में जन्म नहीं, बल्कि सत्य और योग्यता को महत्व दिया जाता था।

इसी प्रकार भारतीय परम्परा में वे व्यास से लेकर सःत रविदास तक एक लंबी श्रृंखला है, जहाँ विविध पृष्ठभूमियों से आए व्यक्तियों ने ज्ञान, भक्ति और समाज-निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। यह परम्परा इस बात की साक्षी है कि भारतीय संस्कृति के मूल में समावेशिता और आध्यात्मिक समता का भाव निहित था, भले ही व्यवहार में समय-समय पर विचलन आए हों।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब ऐतिहासिक तथ्यों को एक पक्षीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है। औपनिवेशिक काल में कई इतिहासकारों और विचारकों ने भारतीय समाज को एक विशेष दृष्टि से देखने और प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इस संदर्भ में प्रो० धर्मपाल जैसे इतिहासकारों ने वैकल्पिक स्रोतों के आधार पर यह दिखाने का प्रयास किया कि भारत की पारम्परिक शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था उतनी जड़ और अन्यायपूर्ण नहीं थी, जितनी उसे बताया गया। उनके शोध यह संकेत देते हैं कि समाज में स्थानीय स्तर पर शिक्षा और ज्ञान का व्यापक प्रसार था।

यहाँ यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि किसी भी समाज में सभी लोग एक जैसे नहीं होते। हर वर्ग, हर समुदाय में ऐसे लोग होते हैं जो नैतिकता के उच्च आदर्शों का पालन करते हैं, और ऐसे भी जो स्वार्थ और अनैतिकता के मार्ग पर चलते हैं। इसलिए किसी एक वर्ग को पूर्णतः दोषी ठहराना या पूर्णतः निर्दोष घोषित करना—दोनों ही अतिवादी दृष्टिकोण हैं।

आज के समय में आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास और समाज को आलोचनात्मक किन्तु संतुलित दृष्टि से देखें। यदि किसी को किसी वर्ग या व्यक्ति से कष्ट मिला है, तो उस पीड़ा को स्वीकार करना और उसका समाधान ढूँढना आवश्यक है। किन्तु साथ ही यह भी देखना चाहिए कि उसी समाज में सुधार की आवाज़ें भी उठती रही हैं। कई बार समाज की व्यथा को सबसे पहले वही लोग व्यक्त करते हैं, जो उसके बौद्धिक या नैतिक नेतृत्व की भूमिका में होते हैं।

अतः यह कहना उचित होगा कि समस्या केवल जाति या किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि मानव प्रवृत्ति की है। श्रेष्ठता का अहंकार और हीनता का बोध—दोनों ही सामाजिक असंतुलन के कारण हैं। समाधान तभी संभव है जब हम इन प्रवृत्तियों को पहचानें और उनसे ऊपर उठने का प्रयास करें।

अंततः चयन हमारे हाथ में है। हम यह तय कर सकते हैं कि हम इतिहास और समाज को केवल आरोपों और पूर्वाग्रहों के माध्यम से देखेंगे, या फिर उसे समझने, सुधारने और आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। समाज में नैतिकता और अनैतिकता, दोनों प्रकार के लोग सदैव रहेंगे। किन्तु यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम किस दिशा को चुनते हैं—विभाजन और द्वेष की या समरसता और सहअस्तित्व की।