डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव—
रात का तीसरा प्रहर था। चारों ओर गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। हवेली के भीतर सब सो चुके थे, किन्तु सुधांशु की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। उसके भीतर कुछ अशांत था—जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे पुकार रही हो। वह धीरे-धीरे उठकर बाहर आँगन में आया।
पीपल का वही वृक्ष स्थिर खड़ा था, किन्तु आज उसकी छाया कुछ भिन्न प्रतीत हो रही थी—अधिक गहरी, अधिक रहस्यमयी। अचानक उसे लगा जैसे किसी ने धीमे स्वर में उसका नाम पुकारा—
“सुधांशु…!”
वह चौंककर इधर-उधर देखने लगा।
“कौन है?”
कोई दिखाई नहीं दिया। किन्तु वह स्वर फिर आया— “आओ…।” अब वह स्वर स्पष्ट था, परन्तु दिशा अज्ञात।
उसके भीतर एक क्षण के लिए भय उत्पन्न हुआ, पर उसी क्षण उसे आचार्य के शब्द स्मरण हो आए— “साधक को भय के उस द्वार को पार करना होता है जहाँ से सत्य की पहली झलक मिलती है।”
उसने अपने मन को स्थिर किया और उस दिशा में चल पड़ा जहाँ से उसे आह्वान का आभास हो रहा था।
हवेली के पीछे एक पुराना, लगभग भूला हुआ मार्ग था जो एक छोटे से वनखंड की ओर जाता था। रात के अंधकार में वह मार्ग और भी भयावह प्रतीत हो रहा था।
पेड़ों की शाखाएँ हवा में हिल रही थीं, और उनके बीच से आती हुई चंद्रमा की हल्की किरणें ज़मीन पर विचित्र आकृतियाँ बना रही थीं। सुधांशु का हृदय तेजी से धड़क रहा था। किन्तु वह आगे बढ़ता रहा।
कुछ दूर चलने के बाद उसे एक प्राचीन मंदिर दिखायी दिया। वह मंदिर अर्ध-खंडित अवस्था में था, मानो वर्षों से उपेक्षित हो।
उसके द्वार पर टूटी हुई मूर्तियाँ पड़ी थीं, और भीतर से एक हल्की-सी धूप की सुगंध आ रही थी—जो यह संकेत दे रही थी कि वहाँ कोई हाल ही में आया था। सुधांशु धीरे-धीरे भीतर प्रवेश किया।
अंदर का दृश्य अत्यंत विचित्र था। मंदिर के मध्य में एक शिवलिंग स्थापित था—किन्तु वह साधारण शिवलिंग नहीं था। उसके चारों ओर एक हल्की-सी प्रकाश आभा फैली हुई थी, मानो वह स्वयं किसी ऊर्जा का स्रोत हो।
सुधांशु के मन में एक अजीब-सी शांति और भय दोनों एक साथ उत्पन्न हुए। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और शिवलिंग के समीप बैठ गया।
उसी क्षण एक गहरी, गूँजती हुई आवाज पूरे मंदिर में प्रतिध्वनित हुई— “वत्स… क्या तुम सत्य के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार हो?” सुधांशु ने चौंककर चारों ओर देखा। कोई दिखाई नहीं दे रहा था। किन्तु वह स्वर अत्यंत स्पष्ट था—मानो स्वयं अंतरिक्ष से आ रहा हो।
उसने धीरे से उत्तर दिया— “यदि सत्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक हुआ… तो हाँ।”
स्वर फिर गूँजा— और यदि सत्य तुम्हारे प्रिय को तुमसे दूर कर दे तो?
यह प्रश्न सुनते ही सुधांशु का हृदय काँप उठा। उसके सामने माधवी का चेहरा उभर आया। उसकी आँखों की वह कोमलता… उसका विश्वास… कुछ क्षण के लिए उसका मन विचलित हो गया। किन्तु फिर उसने अपनी आँखें बंद कीं। “धर्म का मार्ग कठिन होता है…” उसने स्वयं से कहा। फिर उसने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया। यदि वह ईश्वर की इच्छा होगी, तो मैं उसे स्वीकार करूँगा।
अचानक मंदिर के भीतर प्रकाश और भी तीव्र हो गया। शिवलिंग के ऊपर एक क्षण के लिए एक ज्योति प्रकट हुई जैसे अग्नि का कोई सूक्ष्म रूप और उसी क्षण सुधांशु के भीतर एक गहरा कंपन उत्पन्न हुआ। उसे ऐसा लगा जैसे उसके भीतर कुछ टूट रहा है—और कुछ नया जन्म ले रहा है।
उसी समय पीछे से किसी के कदमों की आहट आयी। सुधांशु ने मुड़कर देखा— वह रहस्यमयी संन्यासी मंदिर के द्वार पर खड़े थे। उनकी आँखों में आज एक अद्भुत तेज था।
उन्होंने धीरे से कहा— वत्स… तुमने उस द्वार पर पहला कदम रख दिया है जहाँ से साधना रहस्य में परिवर्तित हो जाती है।
सुधांशु ने पूछा— स्वामीजी… यह सब क्या है? यह स्वर… यह प्रकाश…?
संन्यासी ने शांत स्वर में उत्तर देते हुए कहा कि यह वही है जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। यह शिवत्व की पहली झलक की अनुभूति है।
सुधांशु अभी भी उस अनुभव से बाहर नहीं आ पाया था। उसने धीमे स्वर में पूछा— क्या यह आचार्य की परीक्षा है?
संन्यासी ने उसकी ओर गहरी दृष्टि से देखा— यह केवल परीक्षा नहीं है… यह दीक्षा की शुरुआत है।
मंदिर के बाहर अब हवा तेज़ चलने लगी थी। पेड़ों की शाखाएँ हिल रही थीं, और आकाश में बादल घिर आए थे।
संन्यासी ने कहा— किन्तु ध्यान रखना, वत्स—जितनी गहराई में तुम जाओगे, उतनी ही बड़ी परीक्षाएँ तुम्हारे सामने आएँगी। फिर उन्होंने एक रहस्यमयी बात कही— “और अगली परीक्षा… तुम्हारे अपने हृदय से ही उत्पन्न होगी।”
सुधांशु मंदिर के भीतर खड़ा था। उसके सामने शिवलिंग की ज्योति धीरे-धीरे शांत हो रही थी। किन्तु उसके भीतर जो प्रकाश जागा था— वह अब बुझने वाला नहीं था।