डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
संध्या का समय था। सूर्य धीरे-धीरे पश्चिम के क्षितिज में विलीन हो रहा था और आकाश में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। हवेली के प्रांगण में एक विचित्र शान्ति थी, मानो दिनभर की घटनाओं के बाद प्रकृति स्वयं भी किसी गहन विचार में डूबी हो।
सुधांशु हवेली के पीछे बने एक छोटे से उपवन में बैठा था। सामने एक प्राचीन पीपल का वृक्ष था जिसकी पत्तियाँ हवा के हल्के स्पर्श से धीरे-धीरे काँप रही थीं। उस वृक्ष के नीचे बैठकर उसे आश्रम की याद आ रही थी—आचार्य पद्मनाभ की स्थिर दृष्टि, उनके शब्दों की गहरायी, और वह अदृश्य करुणा जो उनके प्रत्येक उपदेश में झलकती थी।
उसी समय उसके पीछे से एक परिचित स्वर सुनाई दिया—
“वत्स, तुम्हारा मन आज बहुत दूर चला गया है।”
सुधांशु ने मुड़कर देखा। वही रहस्यमयी संन्यासी उसके पीछे खड़े थे। सुधांशु ने तुरंत उठकर प्रणाम किया।
“स्वामीजी, आप यहाँ…?”
संन्यासी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा— “जहाँ साधना की अग्नि जलती है, वहाँ साधक को देखने वाले भी उपस्थित रहते हैं।”
सुधांशु ने उनकी ओर जिज्ञासा से देखा।
“क्या आप मेरे गुरु के दूत हैं?”
संन्यासी कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले— “दूत कहो, साक्षी कहो या केवल एक यात्री— नाम से अधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है।”
कुछ देर दोनों पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। संध्या का अंधकार धीरे-धीरे फैल रहा था।
सुधांशु ने पूछा— “स्वामीजी, क्या आज जो कुछ हुआ वह केवल संयोग था?”
संन्यासी ने उसकी ओर गहरी दृष्टि से देखा।
“तुम्हें क्या लगता है?”
सुधांशु ने कुछ क्षण सोचा।
“मुझे ऐसा लगता है कि यह सब किसी अदृश्य योजना का भाग है।”
संन्यासी ने धीरे से सिर हिलाया।
“तुम्हारी अनुभूति गलत नहीं है।”
फिर उन्होंने कहा— “सच्चे गुरु अपने शिष्य को केवल उपदेश देकर नहीं छोड़ देते। वे उसके जीवन को ही साधना का क्षेत्र बना देते हैं।” सुधांशु के मन में एक हल्का कंपन हुआ।
“तो क्या यह सब… आचार्य की परीक्षा है?” संन्यासी ने सीधे उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने केवल इतना कहा— “कभी-कभी गुरु अपने शिष्य की परीक्षा लेते समय स्वयं भी परदे के पीछे रह जाते हैं। क्योंकि यदि शिष्य को पहले ही पता चल जाए कि यह परीक्षा है, तो उसका निर्णय उतना शुद्ध नहीं रह जाता।”
कुछ देर मौन रहा। फिर सुधांशु ने एक और प्रश्न पूछा— “स्वामीजी, क्या साधना का मार्ग हमेशा इतना कठिन होता है?”
संन्यासी ने हल्की हँसी के साथ कहा—
“कठिन तो वह मार्ग है जिसमें मनुष्य अपने ही मन के विरुद्ध चलना पड़ता है।”
फिर उनका स्वर गम्भीर हो गया—
“वत्स, संसार में दो प्रकार के युद्ध होते हैं—एक बाहरी और एक आन्तरिक।”
“बाहरी युद्ध में शत्रु सामने दिखाई देता है,” उन्होंने कहा, “किन्तु आन्तरिक युद्ध में शत्रु हमारे भीतर छिपा होता है—अहंकार, भय, मोह और स्वार्थ के रूप में।”
सुधांशु ध्यान से सुन रहा था।
संन्यासी ने आगे कहा— “जब साधक इन आन्तरिक शत्रुओं को पहचानने लगता है, तभी उसकी वास्तविक साधना आरम्भ होती है।”
उसी समय हवेली के भीतर से किसी के कदमों की आहट आई। जमींदार धीरे-धीरे वहाँ आ रहा था।
उसने दोनों को देखा और कुछ क्षण तक चुप खड़ा रहा। फिर उसने सुधांशु से कहा— “आज तुम्हारी बातों ने मुझे बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया है।”
सुधांशु ने शांत स्वर में कहा— “यदि मेरे शब्दों से आपको कोई कष्ट हुआ हो तो क्षमा कीजिए।”
जमींदार ने सिर हिलाया।
“नहीं, कष्ट नहीं… बल्कि एक विचित्र जागरण हुआ है।” वह कुछ देर तक पीपल के वृक्ष की ओर देखता रहा।
फिर बोला— “कभी-कभी मनुष्य अपने अधिकार और शक्ति के मोह में यह भूल जाता है कि वह भी उसी परम सत्य का अंश है जो दूसरों में है।”
संन्यासी यह सब सुनकर मुस्करा रहे थे। मानो उन्हें पहले से पता था कि यह संवाद किस दिशा में जाएगा।
रात अब पूरी तरह उतर चुकी थी। आकाश में असंख्य तारे चमक रहे थे।
सुधांशु ने ऊपर आकाश की ओर देखा और उसके मन में एक गहरा विचार उठा— क्या वास्तव में यह सब केवल घटनाएँ हैं… या फिर कोई अदृश्य शक्ति उसे धीरे-धीरे एक नए मार्ग की ओर ले जा रही है?
उसे आचार्य के शब्द याद आए— “शिवत्व की यात्रा में मनुष्य को अपने भीतर जन्मे अंधकार से युद्ध करना पड़ता है।” उसी क्षण उसे लगा— उसकी साधना का वास्तविक संघर्ष अब आरम्भ होने वाला है।