डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
रात गहरी हो चुकी थी। हवेली के चारों ओर फैली शांति में केवल कभी-कभी पत्तों की सरसराहट सुनाई देती थी। दूर खेतों में जलती हुई मशालों की लौ हवा के साथ डोल रही थी।
सुधांशु उस पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा था जहाँ कुछ देर पहले रहस्यमयी संन्यासी उससे संवाद कर रहे थे। अब वहाँ केवल मौन था—किन्तु वह मौन भी जैसे किसी गूढ़ प्रश्न से भरा हुआ था।
उसके मन में बार-बार वही विचार उठ रहा था—
**क्या वास्तव में यह सब आचार्य की योजना है?
या जीवन स्वयं ही उसे किसी गहरे सत्य की ओर ले जा रहा है?**
उसी समय उसके भीतर एक और विचार उठा—एक ऐसा विचार जिसे उसने पहले कभी गंभीरता से नहीं देखा था।
“क्या यह सम्भव है,” उसने मन ही मन सोचा,
“कि मेरे भीतर भी कहीं कोई सूक्ष्म अहंकार छिपा हो?”
यह प्रश्न अचानक आया था, किन्तु उसने उसके मन को झकझोर दिया।
उसे स्मरण हुआ—जब जमींदार ने किसान के पुत्र को मुक्त किया, तब उसके भीतर एक क्षण के लिए एक हल्की-सी संतुष्टि उत्पन्न हुई थी।
एक बहुत सूक्ष्म भावना—
**“मैंने एक बड़ा कार्य किया।”**
वह भावना क्षणभर के लिए ही आई थी, पर अब उसे लगा कि वही भावना उसके भीतर एक बीज की तरह छिपी हुई है।
और तभी उसे आचार्य के शब्द याद आए—
“वत्स, साधना का सबसे बड़ा शत्रु बाहरी संसार नहीं…
मनुष्य का अपना अहंकार होता है।”
—
उसी समय पीछे से कदमों की आहट आई।
सुधांशु ने मुड़कर देखा।
वही रहस्यमयी संन्यासी फिर उसके पास आ खड़े हुए थे।
उन्होंने शांत स्वर में पूछा—
“क्या सोच रहे हो, वत्स?”
सुधांशु ने कुछ क्षण मौन रहकर उत्तर दिया—
“स्वामीजी… मैं अपने भीतर के एक शत्रु को पहचानने की कोशिश कर रहा हूँ।”
संन्यासी की आँखों में एक गहरी चमक आ गई।
“और वह शत्रु कौन है?”
सुधांशु ने धीरे से कहा—
“अहंकार।”
संन्यासी कुछ क्षण तक उसे देखते रहे।
फिर उन्होंने कहा—
“वत्स, यह जान लेना ही आधी साधना है कि शत्रु कहाँ छिपा है।”
फिर वे उसके पास बैठ गए।
“अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है,” उन्होंने कहा, “कभी वह शक्ति के रूप में आता है, कभी ज्ञान के रूप में, और कभी-कभी तो वह त्याग के रूप में भी छिप जाता है।”
सुधांशु ने आश्चर्य से पूछा—
“त्याग में भी अहंकार?”
संन्यासी ने सिर हिलाया।
“हाँ। जब मनुष्य यह सोचने लगता है कि ‘मैं त्यागी हूँ’, ‘मैं दूसरों से श्रेष्ठ हूँ’, तब त्याग भी अहंकार का रूप बन जाता है।”
—
सुधांशु कुछ देर तक मौन बैठा रहा।
फिर उसने पूछा—
“तो साधक को क्या करना चाहिए?”
संन्यासी ने आकाश की ओर देखते हुए कहा—
“साधक को अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित करना चाहिए।”
फिर उन्होंने एक गहरी बात कही—
“जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह केवल एक माध्यम है, तब अहंकार अपने आप क्षीण होने लगता है।”
—
उसी समय हवेली के भीतर से जमींदार भी बाहर आ गया।
वह कुछ दूर खड़ा दोनों की बातें सुन रहा था।
उसने धीरे से कहा—
“यदि संसार में सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है, तो फिर मनुष्य के कर्म का क्या महत्व है?”
संन्यासी ने उसकी ओर देखा।
“कर्म का महत्व इसलिए है,” उन्होंने कहा, “क्योंकि कर्म ही वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान को दूर करता है।”
फिर उन्होंने आगे कहा—
“ईश्वर मनुष्य को स्वतंत्रता देता है—धर्म और अधर्म के बीच चुनने की स्वतंत्रता।”
जमींदार ने गंभीर स्वर में पूछा—
“और यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक अधर्म करता रहे?”
संन्यासी ने शांत उत्तर दिया—
“तब भी उसके भीतर परिवर्तन की संभावना समाप्त नहीं होती।”
—
यह सुनकर जमींदार कुछ देर तक मौन रहा।
फिर उसने धीरे से कहा—
“आज तुम्हारी बातें सुनकर मुझे ऐसा लग रहा है कि शायद मैंने अपने जीवन में कई गलत निर्णय लिए हैं।”
सुधांशु ने विनम्रता से कहा—
“जब मनुष्य अपनी भूल को पहचान लेता है, उसी क्षण से उसका परिवर्तन आरम्भ हो जाता है।”
—
आकाश में उस समय असंख्य तारे चमक रहे थे।
संन्यासी ने उन तारों की ओर देखते हुए कहा—
“संसार का प्रत्येक तारा अपने स्थान पर स्थिर है, फिर भी सब मिलकर एक विशाल ब्रह्मांड बनाते हैं।”
फिर उन्होंने सुधांशु की ओर देखा।
“वत्स, साधना का मार्ग भी ऐसा ही है। हर छोटी घटना, हर छोटा निर्णय—सब मिलकर आत्मा को उस परम सत्य की ओर ले जाते हैं।”
—
उस रात सुधांशु बहुत देर तक सो नहीं पाया।
उसके भीतर एक नई जागृति जन्म ले चुकी थी।
अब उसे यह समझ आने लगा था कि—
**शिवत्व की यात्रा केवल बाहरी त्याग से नहीं होती।
वह भीतर के अहंकार को पहचानने और उसे भस्म करने की प्रक्रिया है।**
किन्तु उसे यह नहीं पता था कि—
उसकी अगली परीक्षा केवल अहंकार की नहीं होगी।
उसकी अगली परीक्षा होगी—
**प्रेम की।**
और वही परीक्षा यह तय करेगी कि
वह वास्तव में **शिवत्व के मार्ग पर कितना आगे बढ़ पाया है।**