नदी अपनी स्वाभाविक गति में (‘गति से’ अशुद्ध है।) बहती रहती है। एक ढेला फेंकने के बाद कुछ क्षण तक जलान्दोलन बना रहता है, तदनन्तर वह अपनी पूर्व-गति पुन: प्राप्त कर लेती है। वह ढेले के मारक प्रहार को शिक्षित करना चाहती है– पहले अपनी सामर्थ्य को तोलो, फिर बोलो और भेद जिया का खोलो। नदी न जाने कितने चक्रवात और नाना विभीषिका को अपने वक्षप्रान्त (सीना) पर झेलती आ रही है और उनके प्रभाव से इतना कठोर बन चुकी है कि उस पर सारी आपदा हलकी (‘हल्की’ अशुद्ध शब्द है।) जान पड़ती है; परन्तु वही नदी जब कराल (भयंकर) काल के ललाट पर अपना रौद्र हस्ताक्षर करती है तब ‘विकराल परिदृश्य’ से स्थावर-जंगम कम्पायमान हो उठता है और इहलोक दोलायमान, इसलिए ‘नदी’ की सात्त्विकता के साथ कोई ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए, कि न तो पश्चात्ताप के लिए अन्तराल मिल सके और न ही प्रायश्चित्त के लिए अवकाश। (‘पश्चाताप’ और ‘प्रायश्चित’ शब्द अशुद्ध हैं।)
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ अगस्त, २०२१ ईसवी।)