विश्व की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को प्रभावित करता, मध्य-पूर्व-भयावह युद्ध

इन दिनो संयुक्त राज्य अमेरिका के उकसावे मे आकर इस्राइल ने अकस्मात् ईरान पर आक्रमण करके जो जघन्य कृत्य किया है, उसकी प्रतिक्रिया मे ईरान की ओर से जिसप्रकार की अप्रत्याशित, अविश्वसनीय एवं अकल्पनीय काररवाई की जा रही है, उसे देख-समझकर विश्व की महाशक्ति एवं अन्य शक्तिमान् देश हतप्रभ हैँ। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आग्रह पर भी उसका कोई मित्र-देश साथ देने से साफ़ मना करता आ रहा है; क्योँकि लगातार एक माह से अधिक की अवधि तक के युद्ध मे ईरान के प्रत्याक्रमण से विश्व-महाशक्ति कहलानेवाला संयुक्त राज्य अमेरिका दहल गया है। इस कारण विश्व के देशोँ का आर्थिक और सामाजिक संतुलन डगमगा गया है।

मध्य-पूर्व की इस युद्ध-विभीषिका से प्रभावित हमारे देश-विदेश का बुद्धिजीवी-वर्ग क्या सोचता है, इसे जानने-समझने के लिए ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से १ अप्रैल को एक अन्तरराष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था, जिसका विषय था– ‘विश्व की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को प्रभावित करता, मध्य-पूर्व भयावह युद्ध’ (संयुक्त राज्य अमेरिका-इस्राइल और ईरान)।

    संयुक्त राज्य अमेरिका की विज़िटिंग स्कॉलर डॉ० नीलम जैन ने बताया– अमेरिका-इस्राइल का ईरान के विरुद्ध छेड़ा गया युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीँ, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का संघर्ष बन चुका है, जिसकी जड़ेँ दीर्घकालीन अविश्वास, परमाणु- कार्यक्रम तथा मध्य-पूर्व मे प्रभुत्व की प्रतिस्पर्द्धा मे निहित है। इसके कारण तेल-आपूर्ति और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर विकट संकट उत्पन्न हो चुका है, विशेषतः होर्मुज़ जलडमरू मध्य को प्रतिबन्धित करने के कारण। यह युद्ध केवल तीन देशोँ का संघर्ष ही नहीँ है, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा भी है। इस विषय मे आर्थिक, नैतिक एवं कूटनीतिक आयाम अधिक निर्णायक सिद्ध हो सकते हैँ।

   श्री राघवेन्द्र सिंह हजारी शासकीय महाविद्यालय हटा, दमोह (मध्यप्रदेश) की हिन्दी-प्राध्यापक आशा राठौर ने कहा– यह युद्ध मानव-सभ्यता के विकासक्रम पर प्रश्नचिह्न लगाता प्रतीत हो रहा है। इससे विश्व की आर्थिक और सामाजिक स्थिति दुष्प्रभावित हो रही है। यहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका की तानाशाही साफ़ दिख रही है। वह अपने आर्थिक लाभ के लिए विश्व को अपने नियन्त्रण मे रखना चाहता है। वैश्वीकरण के युग मे समस्त राष्ट्रोँ की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के साथ किसी-न-किसी रूप मे जुड़ी हुई है, जिससे वे राष्ट्र प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैँ। धन-जन की अत्यन्त हानि हो रही है। अपने विवादित बयानबाज़ी एवं क्रियाकलाप के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की जनता ही अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के विरोध मे सड़कोँ पर उतर आयी है। यही परिदृश्य इस्राइल मे भी दिखता है। इस भयावह युद्ध का परिणाम क्या होगा, कहा नहीँ जा सकता। हाँ, इतना अवश्य है कि युद्ध का परिणाम किसी के भी पक्ष मे हो, पराजय मानवता की ही होती है।

     जमुना क्रिश्चियन कॉलेज, प्रयागराज मे विज्ञान-प्रवक्ता डी० के० सिंह ने कहा– मध्य-पूर्व मे जारी भयावह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के लिए गम्भीर ख़तरा बन चुका है, जिससे ऊर्जा की क़ीमतेँ बढ़ने, आपूर्ति-शृंखला बाधित होने तथा मुद्रास्फीति के कारण विकास-दर धीमी होने की आशंका है। इस संघर्ष ने करोड़ोँ जनता के लिए खाद्य-सुरक्षा को संकट मे डाल दिया है, जिसके कारण क्षेत्र मे व्यापक विस्थापन और मानवीय संकट पैदा हो चुका है। ऐसे मे, बिना किसी संकोच के ट्रम्प को युद्धबन्दी के लिए पहल करनी चाहिए; क्योँकि उन्हीँ की पहल पर युद्ध की शुरूआत की गयी थी।

      आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– युद्ध की विभीषिका से समूची मानव-सभ्यता संत्रस्त दिख रही है; भविष्य का 'भविष्य' का तो दूर है; वर्तमान  ही अपने भविष्य को लेकर सशंक है। हमे नहीँ भूलना चाहिए कि ईरान विश्व मे वरीयता-क्रम मे पाँचवाँ ऐसा शीर्षस्थ देश है, जिसके पास सर्वाधिक तेल-भण्डार है। 'द इकोनॉमिक टाइम्स' के अनुसार, ईरान के पास २०८ बैरल कच्चे तेल का भण्डार है। उसके पास विश्व के कुल तेल-भण्डार का लगभग १२ प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित है। इस दृष्टि से ईरान की वैश्विक उपयोगिता और महत्ता स्वयंसिद्ध दिखती है।

   प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार शाहिद नक़वी ने बताया– मध्य-पूर्व का युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीँ है, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता और सामाजिक शान्ति के लिए एक गम्भीर ख़तरा भी है। यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा असर डाल रहा है :– ऊर्जा-संकट, महँगाई, आपूर्ति-शृंखला में व्यवधान एवं मानवीय संकट इसके प्रमुख परिणाम हैँ। विशेषज्ञोँ का मानना है कि इसका प्रभाव कोविड– १९-जैसी वैश्विक मन्दी के बराबर हो सकता है।

   खामगाँव (महाराष्ट्र) से अध्यात्मवादी एवं ज्योतिर्विद् अंजु स्वामिनी ने बताया– इस युद्ध के कारण तेल की क़ीमतोँ मे वृद्धि हो रही है, जिससे महँगाई बढ़ती जा रही है और आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है। अन्तरराष्ट्रीय व्यापार मे अस्थिरता आ चुकी है और निवेश घटता आ रहा है।

यह संघर्ष सामाजिक स्तर पर, भय, असुरक्षा एवं विभाजन- भावना को जन्म देता है। शरणार्थियों की संख्या बढ़ती है और मानवता संकट मे पड़ जाती है। इस प्रकार, यह युद्ध केवल क्षेत्रीय नहीँ, बल्कि वैश्विक संतुलन और शान्ति के लिए एक गम्भीर चुनौती भी बन चुका है।
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