कई प्रश्नो को गर्भगृह से बाहर करती हुई, अन्तत:, शुकदेव जी की काया भस्मीभूत हुई!

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

जीवन का परम और चरम सत्य क्या है, इसे मनुष्य जानते-समझते हुए भी अपने अवचेतन की थैली मे कसकर बाँधे रहता है। वही मनुष्य जब किसी ‘चिकित्सालय’ अथवा ‘श्मशानघाट’ के परिदृश्य मे स्वयं को पाता है तब कृपणता के साथ उसके द्वारा बाँधी गयी अवचेतन-थैली की ग्रन्थि (गाँठ) स्वत: शिथिलप्राय होने लगती है। ऐसा प्रतीत होने लगता है, मानो मोह-माया मे संलिप्त मनुष्य की ‘जिजीविषा’ (जीने की इच्छा) और ‘जिगीषा’ (जीतने की इच्छा) की अग्नि मन्द पड़ती जा रही हो।

वास्तव मे, ऐसा सोच (‘ऐसी सोच’ अशुद्ध है।) क्षणभंगुर होता है, जो कि परिस्थितिजन्य होता है। धीर-वीर-गम्भीर मनुष्य कभी परिणाम और प्रभाव के मकड़जाल मे फँसता नहीं; क्योंकि वह स्थिति– “आ बैल! ले मार” की हो जाती है। वह अपने भौतिक और आत्मिक जीवन की रेलगाड़ी का चालन एक साथ कभी एक ही पटरी पर नहीं करता; इसके लिए दो समानान्तर पटरियाँ बनी रहती हैं, जो कभी आपस मे मिलती नहीं। निस्सन्देह, पारस्परिक संवाद करते हुए चलती हैं; परन्तु कभी एक-दूसरे से प्रभावित नहीं होतीं। इस प्रकार की जीवनशैली मेरी अपनी है। आपका यदि जीवन इसी भाँति अग्रसर होता रहा तो आपका प्रत्येक पथ विकार-राहित्य का होगा।

शुकदेव जी को जीवन-पर्यन्त यह बोध नहीं हो सका– मेरा कौन अपना है और कौन पराया। अपने गले लगाने के लिए बढ़ते थे तब पराये का ‘घोर मोह’ और ‘मिथ्या आकर्षण’ उन्हें अपनो को दुत्कारने के लिए बाध्य कर देता था। उनके एक भाई का आज एक वाक्य मुझे भीतर तक खंगाल गया है। उन्होंने बताया, “हम लोग जब उनके (शुकदेव जी) घर जाते थे तब वे कहते थे,”तुम लोग यहाँ क्यों आते हो? यहाँ मत आया करो।” तब शुकदेव जी के चेहरे पर भय की लकीरें एक साथ देखी जा सकती थीं। उनके उसी भाई ने बताया, “अभी चार दिनो पहले उन्होंने दो हज़ार रुपये मँगाये थे, तब हमने दिये थे।” यहाँ प्रश्न उठता है– पारिवारिक और सामाजिक मर्यादा को ताक़ पर रखकर उन्होंने जिन लोग को अपना बनाया; किन्तु भयवश उन्हें अपना घोषित करने मे उनका आजीवन मुँह थरथराता रहा, उन सभी से शुकदेव जी को क्या मिला– अवमानना-उपेक्षाभरी ज़िन्दगी!..? कहाँ गये उनके करोड़ों रुपये? कहाँ हैं, उनकी करोड़ों-अरबों की अचल सम्पदा? किसने बना दी थी, उनकी याचनामयी ज़िन्दगी?

जिस व्यक्ति ने संतान को उत्पन्न किया; उसका संवर्द्धन किया; स्वावलम्बी बनाया; विवाहादिक कराया, वही अपने जनक के देहावसान के अनन्तर यह सार्वजनिक कर दे, “मैं शुकदेव प्रसाद की देखरेख करता था। शुकदेव प्रसाद का लेखन प्रभावित न हो, उसके लिए वे ‘अविवाहित’ (जीवनपर्यन्त) रहे।”

आज मै श्मशानघाट गया था और सबसे पहले उसी कथित ‘देखरेख करनेवाले’ और शुकदेव जी को ‘अविवाहित’ बतानेवाले डॉ० अभिषेक को जैसे ही अपना नाम बताया, उसके चेहरे को देखकर ऐसा लगा, मानो उसकी आँखें बोल रही हों, “पर्द:/पर्दा न उठाओ”। मेरा प्रश्न था, “आप शुकदेव जी के पुत्र हैं न?” शुकदेव जी का कथित देखभालकर्त्ता और उन्हें अविवाहित बतानेवाले का सिर झुक गया; बोला, “जी हाँ।”

‘शान्ति’ आज भी अपने नाम को सार्थक कर रही है; किन्तु कालचक्र से चिपकी, ज्ञात-अज्ञात थपेड़ों को बालिका, किशोरी, तरुणी, युवती, प्रौढ़ा तथा वृद्धा के रूप मे असह्य को भी ‘सह्य’ बनाते हुए, ‘अभिशप्त’ सधवा-जीवनयापन करती रही, जबकि ‘निर्मला’ का चरित्र ‘प्रेमचन्द की निर्मला’ के नितान्त (पूर्णत:, बिलकुल, पूरी तरह से) विपरीत लक्षित होता आ रहा है, जो ‘मलयुक्त’ रेखांकित हो रहा है। ऐसी भी निर्मला कैसी निर्मला, जिसका पुत्र आज अपने पिता को ‘अविवाहित’ बता रहा है। प्रणय ‘भिक्षा’ के रूप मे रहा अथवा विनिमय-स्वरूप रहा अथवा विवशता-बाध्यता के रूप मे रहा अथवा सात्त्विक प्रेमप्रसंग के प्रतिदान के रूप मे रहा, अब यह अतीत का विषय बना दिया गया है। जब नायक अथवा नायिका मे से किसी एक की दैहिक स्थिति सदा के लिए समाप्त हो जाती है तब उस कथानक की धारावाहिकता भी समाप्ति की ओर बढ़ने लगती है।

शुकदेव जी ने अपने जीवन के साथ समझौता नहीं किया और जीवन भी अपने रास्ते पर डटा रहा। इस मध्य ‘मृत्यु’ को स्वर्णिम अवसर मिलता रहा, जिसका लाभ वह लेती रही और धीरे-धीरे, अपने आगोश के समीप लाती रही; अन्तत:, एक ‘अश्रुत’ लोरी के माध्यम से उन्हें चिर-निद्रा मे सुला गयी।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ मई, २०२२ ईसवी।)