पं० मोतीलाल नेहरू के जन्म-दिनांक (६ मई) पर विशेष आयोजन
प्रयागराज। एक ऐसा परिवार, जिसकी संवैधानिक और राजनीतिक विरासत विश्व-विश्रुत रही है, का अभिन्न सम्बन्ध इलाहाबाद से रहा है। आज हम जिसे आनन्द भवन के नाम से जानते हैँ, उसे देश को समर्पित करनेवाला वह व्यक्तित्व था, जो वर्ष १९१९ के जलियाँवाला बाग़-काण्ड से इतना आन्दोलित हुआ कि मारे गये निर्दोष भारतीयोँ का शव देखकर उसका रक्त उबल पड़ा; फिर क्या था, नरमपन्थी नेता के रूप मे जाने-पहचाने जानेवाले उस महान् व्यक्ति ने पंजाब मे जाकर उन मारे गये भारतीय लोग के पक्ष मे निश्शुल्क पैरवी की थी। उनका नाम था, पं० ‘मोतीलाल नेहरू’।
उनके जन्म-दिनांक ६ मई के अवसर पर ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे शिमला, इन्दौर, राजकोट, प्रयागराज, औरंगाबाद इत्यादिक स्थानो से बुद्धिजीवी-वर्ग की सहभागिता रही।
इसी क्रम मे शिमला से कवयित्री-लेखिका रचना भार्गव ने बताया– हम पं० मोतीलाल नेहरू को आधुनिक भारत के निर्माता कह सकते हैँ; क्योँकि आधुनिक भारत का प्रारूप उन्होँने ही तैयार किया था। वर्ष १९२८ मे, जब रूढ़िवादी दौर मे दुनिया के कई विकसित देशोँ मे भी महिलाओँ को मतदान करने का अधिकार नहीँ था तब उन्होँंने ही पुरुष और महिला के लिए ‘समान अधिकार’ और ‘सार्वभौमिक वयस्क-मताधिकार’ की पैरवी की थी। पं० मोतीलाल नेहरू ने साफ़ शब्दोँ मे लिखा था– देश का कोई धर्म नहीँ होगा; धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग रखा जायेगा।
इन्दौर से साहित्यकार-समीक्षक प्रो० सुजीत शाकल्ले ने बताया– पं० मोतीलाल नेहरू का आरम्भिक जीवन अभावग्रस्त रहा; परन्तु बदलते समय के साथ उन्होँने अपने पुरुषार्थ के बल पर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी। देश को स्वतन्त्र कराने मे उनकी भूमिका अति महत्त्व की रही। उन्होँने महात्मा गांधी के सम्पर्क मे आते ही अपना जीवन देश के नाम कर दिया था।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने एक संस्मरण सुनाया– पं० मोतीलाल नेहरू ने एक वाद की ऐसी पैरवी की थी कि एक अँगरेज़ सैन्य-अधिकारी इतना बौखला उठा कि वह पं० मोतीलाल से पूछ बैठा– क्या आप मुझे मूर्ख समझते हैँ? इस पर उन्होँने कहा– बिलकुल नहीँ; लेकिन शायद मै ग़लत भी हो सकता हूँ। इससे अदालत मे उपस्थित अधिवक्ता आदिक ठहाका मारने लगे। आचार्य ने बताया कि उनके विधिक तर्क इतने पैने होते थे कि अँगरेज जज भी उनका सामना करने से ख़ौफ़ खाते थे।
राजकोट से राजनीतिविज्ञान के प्राध्यापक प्रो० आशीष मीणा ने बताया– जब वर्ष १९२२ मे महात्मा गांधी ने अपना 'असहयोग आन्दोलन' वापस लिया था तब पं० मोतीलाल नेहरू ने चितरंजनदास के साथ मिलकर 'स्वराज पार्टी' गठित की थी, जिसका उद्देश्य केन्द्रीय विधानसभा मे घुसकर व्यवस्था को निष्क्रिय करना था।
औरंगाबाद से शोधच्छात्रा फ़ातिमा नूर ने बताया– वे एक महान् अधिवक्ता और स्वतन्त्रता-सेनानी थे। उन्होँने वकालत की परीक्षा मे पूरे प्रान्त मे पहला स्थान प्राप्त किया था। वे धर्मनिरपेक्षता के मार्ग पर चलनेवाले प्रथम राजनेता थे।