मीडियाकर्मियोँ को अपनी स्वतन्त्रता का आकलन स्वयं करना होगा

प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे ‘विश्व प्रेस-स्वतन्त्रता-दिवस’ के अवसर पर ३ मई को एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे देश के अनेक मीडियाकर्मी एवं अन्य विचारकोँ की साझेदारी रही। आयोजन मे समस्त विचारकोँ ने समाज को स्वस्थ और सकारात्मक दिशा देनेवाली पत्रकारिता का समर्थन करते हुए, आजकी पत्रकारिता को निर्भीक रूप देने पर सहमति व्यक्त की थी।

नोएडा से वरिष्ठ पत्रकार रजनी माथुर ने कहा– यदि हम लोकतन्त्र के हित मे पत्रकारिता कर रहे हैँ तो इसमे किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीँ है। हम अपनी सीमा और कर्त्तव्यनिष्ठा को समझते हैँ। यदि राष्ट्रीय परिदृश्य मे कुछ ग़लत हो रहा है तो हम उसका प्रकाशन और प्रसारण करने के लिए आज़ाद हैँ; क्योँकि हम कुछ ग़लत नहीँ कर रहे हैँ।

हजारीबाग़ से एक वरिष्ठ पत्रकार रजनीश आचार्य ने बताया– हमे यदि सच दिखाने से रोका जाता है और हम रुक जाते हैँ तो यह मान लिया जायेगा कि प्रेस-स्वतन्त्रता मे सर्वाधिक बाधक हम स्वयं हैँ। हम किसी उधार की आज़ादी नहीँ चाहते।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– योँ तो विश्व मे प्रत्येक ३ मई को ‘विश्व प्रेसस्वतन्त्रता-दिवस का आयोजन किया जाता है; परन्तु वह मात्र एक ख़ानापूर्ति है। आज इस बात की आवश्यकता है कि मुद्रित और वैद्युत-माध्यम के मीडियाकर्मी प्रेस की आज़ादी के मूल सिद्धान्तोँ को व्यावहारिक रूप देते हुए, मीडिया की स्वतन्त्रता का आकलन करे और अपने ‘होने को’ सिद्ध करे। हमारे पत्रकार कितने स्वतन्त्र हैँ, वे इससे अनुमान कर लेँ कि आज भारत विश्व प्रेस-स्वतन्त्रता सूचकांक मे १५७ वेँ स्थान पर है।

नागपुर मे एक समाचार-चैनल से सम्बद्ध एंकर रक्षा उपासने ने बताया– मुझे तब दु:ख होता है जब मै अपनी रिपोर्टिंग के साथ न्याय नहीँ कर पाती। ऐसा इसलिए कि ऐसी व्यवस्था बना दी गयी है या योँ कहूँ कि हमे एक ऐसे बन्धन मे बाँध दिया गया है, जहाँ हमारी आज़ादी एक दु:स्वप्न बना दी गयी है, जहाँ हम चाहकर भी विरोध नहीँ कर पाते।