कहानी-शीर्षक– अन्त

हमेशा चहकती और खिलखिलाती रहने वाली श्रुति न जाने क्यों कुछ दिनों से खामोश थी। परिधि के लिए उसका ये रूप नितांत अपरिचित सा था। उसने कई बार पूछने की कोशिश भी की, लेकिन कोई अर्थ नहीं निकला।

श्रुति, सुमित और परिधि की इकलौती बेटी है। बचपन से ही होनहार और मेधावी रही श्रुति इस वर्ष स्नातक के प्रथम वर्ष में है। पिछले वर्ष हुई इंटरमीडिएट की परीक्षा में भी उसने अपने विद्यालय में प्रथम और इसके साथ ही सम्पूर्ण जिले में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था। जब अगली सुबह के एक प्रतिष्ठित अखबार में उसका साक्षात्कार निकला था, न जाने कितने ही परिचितों के फोन आते ही रहे थे फिर पूरे दिन बधाइयां देने के लिए।

श्रुति थी भी बहुत ही मेहनती और दृढ़ निश्चयी, यही कारण था कि बचपन से लेकर आज तक उसने कभी भी असफलता का मुंह नहीं देखा था। जिस भी प्रतिस्पर्धा में भाग लेती उसमें मानो अपना जी जान ही लगा देती और इसी तरह परिणाम भी हमेशा सकारात्मक ही रहता था। उसकी सफलताओं की एक तस्वीर ये भी थी कि मात्र इतनी कम उम्र में ही उसके नाम के कितने ही मेडल और ट्रॉफी पूरे घर में सजे पड़े थे। उसका एक शौक ये भी था कि अखबार में निकलने वाले ज्यादातर प्रेरक आर्टिकल और वाक्य वो अपने कमरे की दीवारों पर सजा देती थी।

यहां तक कि जब कभी उनके घर कोई मेहमान भी आता, तो वो एक बार अपने बच्चों को श्रुति का कमरा दिखाने की जिद जरूर करता और अपने बच्चों को भी श्रुति की तरह ही पढ़ने और आगे बढ़ने को प्रेरित करता। इन सारी ही बातों से वो और भी उत्साह से भर उठती। जब कभी जरा सी भी निराशा उसके मन मस्तिष्क की ओर बढ़ने का प्रयास भी करती, वह उन्हें इन स्वर्णिम स्मृतियों को याद करके पुनः पीछे ढकेल देती। बड़े ही उत्साह से उसने अपने पसंदीदा कॉलेज में प्रवेश लिया था अपनी आँखों में एक नए सपने के साथ।

नई जगह, नए माहौल और नए दोस्तों के साथ हँसते खिलखिलाते कब पूरा वर्ष निकल गया पता ही नहीं चला। अर्धवार्षिक परीक्षाओं में भी  प्रथम ही आयी श्रुति सिर्फ सहपाठियों की ही नहीं बल्कि शिक्षक -शिक्षिकाओं की भी चहेती बन चुकी थी। उसके माता-पिता के साथ ही कॉलेज में भी सभी को यही उम्मीद थी कि एक बार फिर वो टॉप करेगी ही करेगी। इधर श्रुति अभी तक अर्धवार्षिक परीक्षाओं की अपनी सफलता के उन्माद और सबकी हमेशा मिलती वाह-वाही में डूबकर धीरे-धीरे अपनी पढ़ाई की ओर से कुछ लापरवाह सी होती गयी और इसका एहसास उसे तब हुआ जब अंततः उसकी प्रथम वर्ष की वार्षिक परीक्षाएं प्रारम्भ हो गयीं। पहला पेपर गणित का ही था, यूँ तो गणित में वो हमेशा से ही अच्छी थी फिर भी पर्याप्त अभ्यास न करने से डर उस पर पूरी तरह हावी हो चुका था, किसी तरह सूत्रों को रटना शुरू किया, लेकिन एक चीज याद करती तो लगता दूसरी भूलती जा रही है। फिर भी किसी तरह गणित के पेपर हुए, अब बारी रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान की थी, रसायन विज्ञान पर भी पर्याप्त पकड़ होने से वो भी अच्छी तरह निपट गया, लेकिन अब बारी भौतिक विज्ञान की थी जिसमें उसने वाकई बहुत कम ध्यान दिया था। उसका मनोबल लगातार गिरता ही जा रहा था, जीवन में आज तक असफलता का स्वाद कभी चखा तो था नहीं, भविष्य की कल्पना मात्र से वो विचलित हो उठी। आखिरकार पूरी रात कुछ परीक्षा की तैयारी करते और कुछ अपने डर का सामना करने में गुजर गई। रह रह कर उसके मस्तिष्क में नकारात्मक विचार ही उभर कर आ रहे थे।बार बार यही सोंच रही थी वो कि आखिर कैसे सामना करेगी वो सबका अगर फेल हो गयी तो। यही सब सोंच कर इतनी अधिक उद्वेलित हो उठी वो कि असफलता का सामना करने से बेहतर विकल्प उसे अपने जीवन की समाप्ति करना लगा। इस कठोर निश्चय के साथ ही उसके अश्रु शब्द बनकर कागज पर उतरने लगे–  

“जिन्दगी का क्या भरोसा,
कब तक साथ है,
कितने थे ख्वाब संजोये,
सबकी बस याद है,
कुछ करने की थी ठानी,
शायद कि खुद से बेईमानी,
गर कुछ भी न बचा तो,
कैसी ये जिंदगानी,
छोड़ सकूँगी क्या ये जिन्दगी मैं,
मन में यही सवाल है,
कि शायद जिन्दगी मुझे कुछ पल दे दे,
एक मौका दे दे,
मुझे मेरा कल दे दे,
सपना था, ऊंचाइयों को छूने का,
जीवन को जी भर जीने का,
लक्ष्य ही था मेरा जीवन,
पर शायद भटक गया मेरा ये मन,
यदि छूट गया मेरा ये लक्ष्य,
तो कहना ही होगा अलविदा,
प्यारी जिन्दगी तुझे अलविदा,
प्यारी जिन्दगी तुझे अलविदा ।।”

लिखते लिखते ही जाने कब वो सो गई। सुबह की पहली किरण से पहले ही चाय लेकर परिधि उसके कमरे में हाजिर थी और भला होती भी क्यों न। हमेशा कितनी भी व्यस्त क्यों न हो वो अपनी बेटी के लिए उसके पास वक़्त की कभी कमी नहीं रही और वैसे भी कुछ दिनों से उसे परेशान देख कर परिधि भी परेशान ही थी कि आखिर बात क्या है। उसे यूँ आज फिर मेज पर ही अपनी किताबों पर सर रख कर सोया देख कर मुस्कुरा उठी वो, धीरे से उसके चेहरे को अपने हाथो में भरकर जगाने जा ही रही थी कि उसकी नजर उस अधखुली डायरी पर पड़ी जिसमे लिखते-लिखते ही श्रुति सो गई थी। बंद करने जा ही रही थी कि उसकी नजर आँसुओ से भीगे उस पन्ने के सूखने के बाद फैली हुई स्याही पर पड़ी, बरबस ही उसने डायरी अपने हाथों में ले ली। कविता पढ़ते पढ़ते ही उसका दिल तेजी से धड़क सा उठा। उफ़्फ़, ये क्या करने जा रही थी मेरी बच्ची। झट से सीने से लगा लिया उसको।

मां… वो मैं… मां… श्रुति जैसे आधी नींद में भी मां से लिपट कर रो पड़ी, परिधि ने उसका माथा छूकर देखा जो बुखार से तप रहा था। परिधि ने तुरंत सुमित को जगाया, दोनों ही उसकी हालत देख कर घबरा उठे थे। फिर भी खुद पर काबू रखते हुए किसी तरह उसको दवाई देकर लिटाया उन्होंने।
श्रुति अभी भी बड़बड़ा रही थी, मां मुझे सोना नहीं है, पढ़ना है अभी, आज दोपहर में पेपर है मेरा।

स्तब्ध थी परिधि आज, उसकी मासूम सी गुड़िया जिसे वो इतना मजबूत समझती थी, वो अंदर ही अंदर खुद से हार गई थी, वो भी सिर्फ और सिर्फ इसलिए क्योंकि उस पर हम सब की महत्वकांक्षाओं का भार दिन प्रतिदिन बढ़ रहा था। बस अब और नहीं।

परिधि ने बोलना शुरू किया– ” श्रुति, मेरी बच्ची, तुम हम दोनों के लिए हर चीज से बढ़कर हो, जीवन के किसी भी इम्तिहान में तुम्हे जीत मिले या हार, हम दोनों का प्यार हमेशा तुम्हारे लिए उतना ही रहेगा और रही समाज की बात, तो ये तो दुनिया है, लोग चार दिन बातें बनाएंगे, फिर भूल जाएंगे।”

सुमित ने भी उसे समझाया “बेटा, जिंदगी में न जाने कितने ही झंझावात आते हैं, लेकिन उनके डर से हम आगे बढ़ना तो नहीं छोड़ देते न।”

“जी पापा”, कहकर  श्रुति अब फिर पहले की तरह खुल कर मुस्कुरा रही थी, अब उसके मन मे कोई डर नहीं था, न भविष्य  की अनिश्चितता का और न ही किसी असफलता का। जैसे बरसों से उसके मन पर लदा हुआ कोई बोझ उतर गया हो।।

  

✍️अनुश्री त्रिपाठी मिश्रा