डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव —
तुम्हारे पास कमी है वक़्त की,
और मैं ख़ुद में बहुत व्यस्त हूँ।
हमारे रास्ते कभी एक नहीं हुए
तुम अपने में, मैं अपने में मस्त हूँ।
जानिबेमंज़िल जाते टकरा गये तो
बात होगी, क्या करें वक़्त नहीं है?
जब वक़्त था तब भी तो अलग थे,
अब ज़िन्दगी की जद्दोजहद से पस्त हूँ।
मैने कभी चाहा था कि कुछ पल,
तेरे साथ रहें और वक्त ठहर जाये।
मगर इन घड़ियों की साज़िशें देखो,
वक्त ही न दिया कि सुने और सुनायें।
तुम्हें भी इस बेदम बेरहम दुनिया ने,
कितने ही सवालों पर सताया होगा?
नर्म लहजे को छोड़ दिया अब सख्त हूँ।
मैं अपनी ही शाखों मे उलझा दरख्त हूँ।
अब न शिकवा है फ़ासलों से,
और न कोई इल्ज़ाम राहों पर।
बस इतना समझ लिया हमने
उड़ान मत भरना गैर के परों पर।
दुनिया मे कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं,
जो दिल मे बसते हैं और चलते हैं।
रिश्ते दूर हों या पास आसान नहीं होते।
रिश्तों को लेकर मै बेहद स्पष्ट हूँ।
तुम हो मंजिल के साहिल पर,
मैं मन की लहरों में खोया हूँ
कामयाबी तुम्हारी बता रही है,
बड़ी कीमत चुकाकर पाया है।
मैंने कभी कुछ ख़्वाब पुराने
तह करके दिल में रख छोड़े थे।
गुजरे हुए उन लम्हों को यादकर।
टूटा हुआ मै खुद से ही रुष्ट हूँ।
अगर कभी भीड़ मे आँखे तेरी
अनजाने मुझसे मिल जायें।
शायद यादों की सुनहरी चमक,
आँखों को पल भर भटका जाए।
पर फिर हम दोनों मुस्कराकर
अपने-अपने रास्ते चल देंगे।
तुम अपनी बज्म मे खुश रहना
मैं भी अपनी तन्हाई में मस्त हूँ।
इसे इश्क़ नहीं तो क्या कहेंगे?
जो बिन कहे साथ निभाता था।
जब पास नहीं होते थे तब भी
ये दिल तेरा नाम दोहराता था।
मगर अब न उम्मीदें ज़िंदा हैं,
न पहले जैसी फ़ुर्सत है हमे।
तुम अपनी दुनिया मे आबाद रहो
मैं ग़मो मे रहने का अभ्यस्त हूँ।
अब जो भी है और जैसा भी है,
क्यों न उसे स्वीकार किया जाए!
जो मिल न सके उन लफ्ज़ों को
अधूरे अल्फाज लिख दिया जाये।
जिन्दगी मे फिर से कभी मुकद्दर
हम दोनो को अगर मिलायेगा।
देखेंगे कौन बदला वक्त के साथ
परेशान तुम हो या मै त्रस्त हूँ।