धरती पर फिर गूँज उठे मर्यादा पुरुषोत्तम नाम प्रिये

मर्यादा की रेखा मे ही, जग का सारा मान प्रिये।
सूरज, चन्दा, नवग्रह रखते इस मर्यादा का भान प्रिये।
सागर क्षुब्ध मगर सीमा मे, सीमा मे ही वायु बहे।
जिस दिन ये मर्यादा टूटी, मिट जाएगा संसार प्रिये।

अग्नि, वायु, नभ, धरा, वारि सब विधान मे बंधे हुए।
प्रभु की इच्छा से सब के सब अपनी कक्षा मे सजे हुए।
अहंकार के वशीभूत हो जो समझ रहे खुद को कर्ता।
याद रखें सब लीला प्रभु की, वही जगत के हर्ता-भर्ता।

राम असीमित चेतना, ब्रह्माण्डों की श्वास प्रिये।
उनसे ही आलोकित है जीवन का विश्वास प्रिये।
ज्ञान-ध्यान-अध्यात्म शक्ति से, बदला युग का रूप प्रिये।,
ज्ञान सनातन वाला लाता अन्धकार मे कांति प्रिये।

जहाँ राम का स्मरण है, वहाँ सत्य आधार प्रिये।
मर्यादापथ हीन ज़िन्दगी है निकृष्ट बेकार प्रिये।
विश्व शांति लाने के खातिर, एक यही अरमान प्रिये।
धरती पर फिर गूँज उठे मर्यादा पुरुषोत्तम नाम प्रिये।