आदित्य त्रिपाठी, हरदोई—
भारत जैसे विशाल और बहुलतावादी लोकतंत्र में मीडिया को परंपरागत रूप से “चौथा स्तम्भ” माना गया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ-साथ मीडिया की भूमिका लोकतांत्रिक जवाबदेही (accountability) सुनिश्चित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। मीडिया न केवल सूचना का माध्यम है, बल्कि यह जनमत निर्माण, सत्ता पर निगरानी (watchdog function) और सामाजिक विमर्श को दिशा देने का भी कार्य करता है।
किन्तु समकालीन परिदृश्य में यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है कि क्या भारतीय मीडिया अपनी भूमिका का निर्वहन ईमानदारी और संतुलन के साथ कर पा रहा है? विशेष रूप से अनुवर्तन (follow-up) पत्रकारिता का क्षय, सनसनीखेज पत्रकारिता (sensationalism) और टीआरपी/विक्रय-केन्द्रित दृष्टिकोण ने मीडिया की विश्वसनीयता मे सेंध लगा दी है।
पत्रकारिता केवल किसी घटना को “ब्रेक” करने तक सीमित नहीं होती; उसका वास्तविक उद्देश्य उस घटना के विकास, परिणाम और प्रभाव को निरंतर जनता तक पहुँचाना है। यही प्रक्रिया अनुवर्तन पत्रकारिता कहलाती है। अनुवर्तन से नागरिकों को यह समझने में सहायता मिलती है कि—
किसी घटना के बाद क्या कार्यवाही हुई? संबंधित संस्थाएँ किस प्रकार प्रतिक्रिया दे रही हैं और दीर्घकालिक परिणाम क्या हैं? अनुवर्तन के अभाव में समाचार अधूरा रह जाता है। यह स्थिति पत्रकारिता को क्षणिक सूचना-प्रसार तक सीमित कर देती है, जबकि उसका उद्देश्य सार्थक सूचना प्रदान करने के साथ जनजागरण होना चाहिए।
वर्तमान में देखा जा रहा है कि कई समाचार माध्यम प्रारम्भिक घटना को अत्यधिक प्रमुखता देते हैं—उसे “ब्रेकिंग न्यूज़” के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं। परंतु कुछ ही दिन में वही मुद्दा मीडिया की प्राथमिकता से बाहर हो जाता है।
यह प्रवृत्ति मुख्यतः तीन कारणों से उत्पन्न होती है:
पहला कारण समाचार चैनलों के लिए दर्शक संख्या (TRP) और समाचार पत्रों के लिए प्रसार संख्या (circulation) है। यह आर्थिक कारण है और चैनल पर इसका सबसे ज्यादा दबाव है। इस कारण वे उन खबरों को प्राथमिकता देते हैं जो अधिक ध्यान आकर्षित करें, भले ही वे दीर्घकालिक रूप से कम महत्त्वपूर्ण हों। दूसरा कारण डिजिटल युग में “सबसे पहले” खबर देने की होड़ है। इस प्रवृत्ति ने गहन विश्लेषण और अनुवर्तन की आवश्यकता को पीछे धकेल दिया है। तीसरा और वर्तमान मे मीडिया को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला कारण राजनैतिक वफादारी है। कभी-कभी मीडिया संस्थान विशेष राजनीतिक या वैचारिक रुझानों के कारण कुछ मुद्दों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं, जबकि अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों की अनदेखी कर देते हैं।
भारतीय मीडिया के हालिया इतिहास में कई ऐसी घटनाएँ देखी गई हैं जहाँ प्रारंभिक कवरेज अत्यधिक रहा, परंतु अनुवर्तन सीमित या नगण्य रहा। किसी बड़े आपराधिक मामले या दुर्घटना के समय मीडिया का व्यापक कवरेज होता है, परंतु न्यायिक प्रक्रिया, पीड़ितों की स्थिति या नीतिगत सुधारों पर नियमित रिपोर्टिंग कम देखने को मिलती है। सामाजिक आंदोलनों या विरोध प्रदर्शनों को प्रारंभिक चरण में प्रमुखता मिलती है, परंतु उनके परिणाम और दीर्घकालिक प्रभाव पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती है। ग्रामीण या हाशिए के समुदायों से जुड़ी समस्याएँ (जैसे जल संकट, शिक्षा, स्वास्थ्य) कभी-कभार सुर्खियों में आती हैं, परंतु निरंतर अनुवर्तन के अभाव में वे फिर से उपेक्षित हो जाती हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि मीडिया का ध्यान घटना-केन्द्रित (event-centric) हो गया है, जबकि उसे प्रक्रिया-केन्द्रित (process-centric) होना चाहिए।
मीडिया अध्ययन में कुछ प्रमुख सिद्धांत इस स्थिति को समझने में सहायक हैं:
पहला है एजेंडा-सेटिंग सिद्धांत (Agenda Setting Theory)। यह सिद्धांत बताता है कि मीडिया यह निर्धारित करता है कि जनता किन मुद्दों को महत्वपूर्ण माने। यदि मीडिया अनुवर्तन नहीं करता, तो वे मुद्दे सार्वजनिक विमर्श से गायब हो जाते हैं।
दूसरा गेटकीपिंग सिद्धांत (Gatekeeping Theory) है। समाचार चयन की प्रक्रिया में संपादकीय निर्णय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि गेटकीपिंग प्रक्रिया बाज़ार या राजनीतिक प्रभाव से संचालित होती है, तो समाचार की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
तीसरी चीज फ्रेमिंग (Framing) है। मीडिया जिस प्रकार किसी घटना को प्रस्तुत करता है, वह जनमत को प्रभावित करता है। सनसनीखेज फ्रेमिंग वास्तविक मुद्दों को विकृत कर सकती है।
मीडिया की गिरती साख केवल एक पेशागत समस्या नहीं है; यह लोकतंत्र के लिए भी चुनौती है। जवाबदेही में कमी ने इसे और कमजोर किया है। यदि अनुवर्तन नहीं होगा, तो सत्ता संस्थाओं पर दबाव कम हो जाएगा। सोशल मीडिया भ्रम और दुष्प्रचार के बल पर ही फल-फूल रही है। अधूरी जानकारी से नागरिकों में भ्रम फैल सकता है।
जनविश्वास का ह्रास जब दर्शक या पाठक मीडिया को पक्षपाती या असंगत मानने लगते हैं, तो उसकी विश्वसनीयता कम हो जाती है।
इस प्रकार, मीडिया का यह रुझान लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
मीडिया की साख को पुनर्स्थापित करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं। समाचार संस्थानों को प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना के लिए फॉलो-अप प्रोटोकॉल विकसित करना चाहिए। पत्रकारिता में सत्यता, निष्पक्षता और जिम्मेदारी के सिद्धांतों को पुनः सुदृढ़ करना आवश्यक है। पत्रकारों को डेटा पत्रकारिता, खोजी पत्रकारिता और विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। नागरिकों को भी जागरूक होकर गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता की मांग करनी चाहिए और सनसनीखेज सामग्री को बढ़ावा देने से बचना चाहिए। स्व-नियमन (self-regulation) के साथ-साथ मीडिया परिषदों और नियामक संस्थाओं को भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
भारतीय मीडिया आज एक संक्रमणकाल से गुजर रहा है, जहाँ एक ओर तकनीकी प्रगति और सूचना की तीव्रता है, वहीं दूसरी ओर विश्वसनीयता और उत्तरदायित्व की चुनौतियाँ भी हैं। अनुवर्तन पत्रकारिता का अभाव मीडिया को अल्पकालिक और सतही बना रहा है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो मीडिया का “चौथा स्तम्भ” होने का दर्जा केवल औपचारिक रह जाएगा। अतः आवश्यक है कि मीडिया स्वयं आत्ममंथन करे और अपनी मूल भूमिका—सत्य, संतुलन और समाजहित—की ओर लौटे।
पत्रकारिता अंधेरे में तीर चलाने का कार्य नहीं, बल्कि समाज के लिए दिशा-निर्देशक दीपक बनने का दायित्व है।