हम भारतीय कल ग़ुलाम थे तो आज क्या हैँ?

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन-दिनांक (१० मई) की पूर्व-संध्या मे आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन

प्रयागराज। वर्तमान समग्र राष्ट्रीय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, संवैधानिक इत्यादिक) को देख और समझकर मन आहत हो उठता है और एक आह निकल आती है, जो इस भाव को निरूपित करती हुई दिखती है– काश! हम आज़ाद नहीँ होते। ऐसा इसलिए कि पराधीन भारत को स्वाधीनता दिलाने के लिए हमारे जितने रणबाँकुरे देश की आन पर बलिदान हो गये थे, उसका औचित्य देश नहीँ समझ पा रहा है। एक ही स्वर उठता है– हम कल ग़ुलाम थे तो आज क्या हैँ?

इसी विषय पर 'सर्जनपीठ', प्रयागराज की ओर से एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे देश के कई राज्योँ के प्रबुद्धजन ने अपना-अपना मत व्यक्त किया।

ग्रेटर नोएडा से साहित्यकार एवं कवयित्री मीनू शाण्डिल्य ने कहा– बेशक, हम तब चौँक उठते हैँ जब हमे हमारे अधिकार के लिए शान्तिप्रिय आन्दोलन, धरना-प्रदर्शन तक नहीँ करने दिया जाता; यहाँ तक कि हमारी अभिव्यक्ति पर पहरा बैठा दिया जाता है और हमारी आवाज़ बन्धक बना ली जाती है। हम करेँ तो क्या करेँ?

बेगूसराय से गृहिणी नसरीन बेग़म का मानना है– हम आज कहने के लिए विवश हैँ– जिसे नाज़ है हिन्द पर, वो कहाँ हैँ? हमारे स्वतन्त्रतासेनानियोँ ने भारतवासियोँ की अकथनीय पीड़ा देखकर ही भारतमाता के चरणो मे अपना सर्वस्व लुटा दिया था, जोकि अब ठगा-ठगा-सा दिख रहा है। इस विषय पर देश की जनता को सोचना होगा।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– भारतीय स्वाधीनता-संग्राम पराधीन भारत का प्रथम विद्रोह था, जो १० मई, १८५७ ई० को मेरठ से प्रारम्भ हुआ था, जिसके आज १६९ वर्ष पूरे हो चुके हैँ। प्रयागराज-स्थित चौक के नीम के पेड़ और चौफटका के आगे के इमली के पेड़ साक्षी रहे हैँ कि अँगरेज़-प्रशासन ने इलाहाबाद और आस-पास के हज़ारोँ सेनानियोँ की गरदन मे रस्सी बाँधकर उन वृक्षोँ की डालियोँ से लटकाकर उनका दु:खान्त किया गया था; किन्तु हम भारतवासियोँ के लिए घोर लज्जा का विषय है कि उनके त्याग-बलिदान को भूलकर आज़ाद भारत की दुर्दशा करने पर उतारू हैँ। हमे आज गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा– हम भारतीय कल ग़ुलाम थे तो आज क्या हैँ?

जगदलपुर से प्राध्यापक डॉ० रश्मि उपाध्याय ने कहा– बेशक, यह समीचीन विषय है, जो हम भारतवासियोँ के मन-प्राण को घायल करता दिख रहा है। अचानक! भारत की समृद्धि, शान्ति और सम्पन्नता पूरी तरह से संकट मे कैसे पड़ गयी है, इस पर हमारे प्रमुख बुद्धिजीवियोँ को सोचना पड़ेगा।