● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
कैसे तुम श्री राम हो, उन्मादी के संग!..?
भक्ति-भाव से दूर सब, गिरगिट-सा है रंग?
दो–
राम रमापति भूलकर, रक्त से रँगते भव।
उन्मादी ललकारते, बने लावारिश शव।।
तीन–
मन्दिर-मस्जिद कुछ नहीं, साथ रहेगा कर्म।
भले रगड़ लो माथ तुम, दूर रहेगा धर्म।।
चार–
अस्ली-नक़्ली कौन है, गिरगिट का है देश।
आँखें पथराती यहाँ, तरह-तरह के वेश।।
पाँच–
राजनीति है ताइफ़:† कमर हिलाते लोग।
लोकतन्त्र को खा रहे, कर सुविधा-उपभोग।।
शब्दार्थ :― † वेश्या और उसके साज़िन्दे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)