पृथ्वी तो हमारी रग-रग मे है; समादर करना सीखेँ

आज (२२ अप्रैल) ‘विश्व-पृथ्वीदिवस’ है।

जिस धरती पर हम उत्पन्न हुए हैँ, वही हमारा 'धराधाम'/'धरा-धाम' है। हम उसी मिट्टी मे गिरते-पड़ते, लुढ़कते और लोटते वय-वार्द्धक्य के साथ आज वहाँ तक पहुँचे हैँ, जहाँ से हम स्वर निनादित कर रहे हैँ। हम कृतज्ञ हैँ, अपनी उस 'माटी' के प्रति, जिसने अपने क्रोड़ मे भरते हुए, हमे जीवन जीने की कला मे दीक्षित किया है। वही 'मृदा' है, जो 'क्षिति' के रूप मे हमारे जीवन के साथ 'पञ्चतत्त्व' ('पञ्च तत्त्व' और 'पंचतत्व' अशुद्ध हैँ।) के एक संघटक के रूप मे विद्यमान है।

आज (२२ अप्रैल) 'विश्वपृथ्वी-दिवस' है। ऐसे अवसर पर साहित्यजगत् के अधिनायक/प्रतिनायक (तानाशाह) कबीरदास की पंक्तियाँ जीवन्त हो उठती हैँ :–
 "खोदखाद धरती सहै, काटकूट बनराय।
 कुटिल बचन साधू सहै, औरन सहा न जाय।।"
    
यह सहिष्णुता (सहनशीलता) और क्षमाशीलता की पराकाष्ठा (सम्बन्धित भाव/रस की अन्तिम सीमा से परे की स्थिति) है। इसके बाद भी समाज मे एक वर्ग ऐसा है, जो 'कृत्रिम परीक्षक' के रूप मे दिखता है; यह पृथक् विषय है कि यदि उस वर्ग का परीक्षण किया जाये तो वह 'सफलता' से सुदूर ही लक्षित होता है। ऐसे परीक्षकोँ को ठोस धरातल की आवश्यकता है, जिस पर बैठकर वे आत्मचिन्तन की ओर प्रवृत्त होँ। धरती अर्थात् पृथिवी/पृथ्वी, वनप्रान्तर, साधु आदिक 'क्षमाशीलता' की प्रतिमूर्ति हैँ। 
  
साधु एक प्रकार की प्रवृत्ति है, जो न्यूनाधिक प्रत्येक जीवधारी मे बनी रहती है। प्रवचन कर, अपनी अहम्मन्यता की तुष्टि और पुष्टि करनेवाला उपदेशक साधु-आचरण की सभ्यता से कोसोँ दूर रहता है; क्योँकि उसका वस्त्र-विन्यास और विचार सात्त्विक प्रतीत तो होता है; परन्तु आचरण कुत्सित-कलुषित रहता है, जिसका हम नित्य-प्रति प्रत्यक्षीकरण करते आ रहे हैँ।
   
एक पृथ्वी, जो पृथ्वीनाथ पाण्डेय के नाम-रूप से समाज मे अपना शुचितापूर्ण सारस्वत वितान ताने हुए है, के नीचे बैठकर आज लाखोँ की संख्या मे अध्ययन के प्रति अदृश्य-दृश्य आग्रहमानजन/आग्रहशीलजन सदाशयतापूर्वक स्वाध्याय की ओर अग्रसर हो रहे हैँ, समझ पाना सहज नहीँ है, जितना समझा जाता है। ऐसा इसलिए कि उस संबोध-स्तर तक पहुँचने के लिए उसकी कठोर साधनापक्ष के साथ सम्पृक्त (सम्बद्ध) होना पड़ेगा, जो 'हस्तामलक' (सहज प्राप्य) नहीँ है। सत्य यह है कि जब 'मै' ही पूरी तरह से 'अपने को' समझ पाने मे समर्थ नहीँ दिखता, जो उसका चरित्र जी रहा होता है तब अन्य कोई कैसे समझ सकता है।
 
हाँ, इतना अवश्य है कि पृथ्वीनाथ किसी 'नाम' की बैसाखी लेकर नहीँ चलता। वह अपने जीवन-मूल्योँ के प्रति जितना कठोर है, उतना ही मृदु भी।  संवाद-प्रतिसंवाद करके देखिए, फिर आप-द्वारा पुष्पित-पल्लवित भ्रमान्धकार छँट जायेगा। आजतक किसी ने भी यह समझने का प्रयास ही नहीँ किया― वह भाषा-स्तर पर शुचिता (पवित्रता) के प्रति इतना क्योँ और कहाँ आग्रही है?
  
सच यह है कि आज कोई व्यक्ति नहीँ चाहता कि पृथ्वीनाथ उसकी दु:खती ('दुखती' अशुद्ध है।) रग (स्त्रीलिंग-शब्द) का स्पर्श तक करे, जबकि वह अपने परिवेश से कुछ-न-कुछ सीखता रहता है। 

जो भी व्यक्ति जान-बूझकर भाषिक शुद्धता की उपेक्षा करता है और अनेकश: बताने-समझाने के अनन्तर भी स्वयं को 'संज्ञाशून्य'-सा अनुभव कराता रहता है, उसके प्रति वह निर्मम हो जाता है। जो व्यक्ति भाषा-साहित्य-शुचिता की दृष्टि से कर्मशील दिखता है; ऐतिहासिक पत्रिका का सम्पादन करता है; सारस्वत (सरस्वती से सम्बन्धित) अवदान करने की भूमिका मे दृष्टिगत होता है, वह यदि सामान्य स्तर पर भी व्याकरणिक अशुद्धि करता है तो क्या उस अशुद्धि-प्राचुर्य पर दृष्टि निक्षेपण करने की आवश्यकता नहीँ है? वस्तुत: उसकी अशुद्धि उस तक ही सीमित नहीँ रहती; प्रत्युत पंख लगाकर वायुमण्डल मे परिव्याप्त हो जाती है। जब शब्द शैक्षिक, बौद्धिक और साहित्यिक जगत् मे सम्प्रेषित किये जाते हैं तब उनका निहितार्थ होता है; वे सोद्देश्य होते हैँ और प्रयोजनमूलक-अभिमूलक भी। 

विचक्षणजगत् अपने व्याख्यान मे शब्द को 'ब्रह्म' के रूप मे प्रतिष्ठित करता है, तो क्या वह अशुचि शब्द-प्रयोग कर, अपने उसी ब्रह्म को कलुषित करने का पक्षधर हो सकता है? दो प्रकार के रूप का प्रदर्शन न करेँ― कल दूसरा 'पृथ्वीनाथ' दिखेगा; रूप विवर्ण कर देगा। शब्दोँ के साथ बल-प्रयोग न करेँ; क्योंकि जब शब्द संघातक-रूप धारण कर लेगा तब 'अन्यथा' की ही सम्भावना लक्षित होती रहेगी।

आज के समय मे प्रकाण्ड शब्दवेत्ता भी शब्द-संधान-अनुसंधान करने का साहस तक बटोर नहीँ पाते, क्योँ? विचारणीय और शोचनीय ('सोचनीय' अशुद्ध है।) प्रश्न बन जाता है।
  
आज हिन्दी-विषय के महिला-पुरुष प्राध्यापक, जो लाखोँ रुपये प्रतिमाह वेतन अर्जित कर रहे हैँ, उनमे से बहुसंख्य ऐसे हैँ, जिनका 'वाचन'' और 'लेखन-स्तर' पर हिन्दीभाषाव्यवहार/हिन्दीभाषा-व्यवहार नितान्त दयनीय है। ऐसे ही लोग आज पूर्व-जन्मो के सुकृत्योँ के परिणामस्वरूप ''अन्धोँ मे काना राजा'' की भूमिका का निर्वहण करते देखे जा रहे हैँ।
  
'अरण्यरोदन' और 'विधवा-विलाप' वही करते हैँ, जिनका नैतिक साहस समाप्तप्राय है। एक समय आयेगा, जब भाषा की उपेक्षा करनेवाले 'समवेत स्वर मे सामाजिक रोदन' करते हुए दिखेँगे, जो समाज मे उपहास (हँसी) के पात्र बनते रहेँगे।
   
अब भी समय है, ऐसे जन चेत जायेँ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ अप्रैल, २०२६ ईसवी।)