डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
आश्रम में संध्या उतर चुकी थी। वटवृक्ष के नीचे बैठे सुधांशु की आँखें बंद थीं। आचार्य के शब्द उसके भीतर मर्मस्थान को वेध रहे थे। वास्तव मे ये विचार अब परिपक्व होकर अनुभव बन चुके थे। उसके भीतर एक-एक कर सभी पहचानें उभरने लगीं— मैं पुत्र हूँ… मैं पति हूँ… मैं साधक हूँ और फिर… एक-एक करके वे सब जैसे विलीन होने लगीं।
अचानक उसके भीतर वही श्लोक गूँज उठा— *“न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः। पिता नैव मे नैव माता न जन्मः॥”*
उसका श्वास गहरा हो गया। उसे अनुभव हुआ— *“मैं शरीर नहीं हूँ… तो फिर मृत्यु किसकी?”*
एक और परत टूटी— उसे लगा जैसे जन्म की स्मृतियाँ, संबंधों की धारणाएँ—सब धीरे-धीरे धुंधली हो रही हैं। *“पिता नहीं… माता नहीं… जन्म भी नहीं…”* उसके भीतर एक हल्का भय उत्पन्न हुआ। यदि यह सब नहीं तो फिर मैं कौन हूँ? किन्तु उसी क्षण भीतर से एक उत्तर उठा— *“तू वही है जो इन सबका साक्षी है…।”*
श्लोक आगे बढ़ा— *“न बन्धुः न मित्रं गुरुः नैव शिष्यः…”* सुधांशु के सामने एक-एक कर सभी चेहरे उभरे। माधवी… अनिरुद्ध… आचार्य… और फिर— वे सभी उसी प्रकाश में विलीन हो गए।
उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे— पर यह दुःख के आँसू नहीं थे। यह उस अनुभूति के आँसू थे— जहाँ प्रेम किसी एक से नहीं; अपितु समष्टि से हो जाता है। उसी क्षण उसके भीतर एक गहरी शांति उतर आई। अब कोई प्रश्न नहीं था। कोई पहचान नहीं थी। केवल एक अनुभूति थी और वह थी *“शिवोऽहम्…।”*
सूर्यदेव ने अपनी आँखें खोली ही थीं, तभी माधवी आश्रम पहुँची। उसके मन में अभी भी एक हल्का कंपन था—पर अब वह पीड़ा नहीं थी, बल्कि एक शांत स्वीकार था। वह धीरे-धीरे वटवृक्ष की ओर बढ़ी। सुधांशु वहीं बैठा था। किन्तु आज कुछ अलग था। उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो पहले कभी नहीं थी—न वैराग्य, न संघर्ष… केवल एक निर्मल, निष्कलुष प्रकाश।
माधवी ने धीरे से पुकारा— “सुधांशु…।” सुधांशु ने आँखें खोलीं। उसने माधवी की ओर देखा— पर उस दृष्टि में अब ‘मेरा’ और ‘तेरा’ का भेद नहीं था। माधवी ने पूछा— क्या आपने मुझे छोड़ दिया है?
सुधांशु ने बहुत कोमल स्वर में कहा, माधवी! जिसे पकड़ा ही नहीं; उसे छोड़ा कैसे जा सकता है? माधवी की आँखें नम हो गईं और उसने गहरे स्वर मे कहा ‘और हमारा प्रेम’…?
सुधांशु ने शांत स्वर में कहा— पहले वह सीमित था—तुम तक, मेरे तक… अब वह विस्तृत हो गया है—सबमें।
वह आगे बोला— अब मैं तुम्हें केवल ‘अपनी’ नहीं देखता… मैं तुम्हें उसी चेतना का अंश देखता हूँ… जो मुझमें है।
माधवी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर भी एक शांति उतरने लगी। तो क्या यही भक्ति है? उसने पूछा।
सुधांशु ने कहा— हाँ! जब प्रेम में कोई अपेक्षा नहीं रहती, जब प्रेम अनायास ही मन-मस्तिष्क को अपनाने लगता है, तब वही भक्ति बन जाता है।”
उसी समय अनिरुद्ध दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में संतोष था। वह धीरे से बोला— “अब यह प्रेम बंधन नहीं… मुक्ति बन गया है।”
संध्या का समय था। मन्द-मन्द शीतल वायु मन को प्रफुल्लित कर यही थी। आश्रम में सभी एकत्र थे। आचार्य वटवृक्ष के नीचे बैठे थे। सुधांशु उनके सामने था। माधवी और अनिरुद्ध भी पास ही खड़े थे। तभी आचार्य ने धीरे से कहा— “वत्स, अब तुम्हारी यात्रा पूर्ण हुई।”
सुधांशु ने शांत स्वर में कहा— “गुरुदेव… यात्रा समाप्त नहीं हुई…
वह केवल ‘मैं’ से ‘हम’ में बदल गई है।”
आचार्य मुस्कराए। “यही तो पूर्णता है।”
सुधांशु ने आँखें बंद कीं। उसके भीतर वही श्लोक पुनः गूँजा—
*“न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः। पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।*
*न बन्धुः न मित्रं गुरुः नैव शिष्यः। चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।”*
और फिर इसके बाद सब कुछ शान्त हो गया।
वह मौन शून्य नहीं था। वह पूर्ण था। उसमें न कोई प्रश्न था, न कोई उत्तर। केवल एक अनुभूति *“शिवोऽहम्… शिवोऽहम्…”*
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आकाश में सूर्य अस्त हो चुका था। पर भीतर— एक ऐसा प्रकाश जल चुका था जो कभी बुझने वाला नहीं था।
शिवत्व कोई कथा नहीं है… न ही कोई लक्ष्य। वह तो वह सत्य है— जिसे जब मनुष्य पहचान लेता है, तो वह स्वयं कथा बन जाता है।