डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
विद्या परमं धनम् ! यह केवल एक सूक्ति नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सत्य है। धन, पद, यश और वैभव समय के साथ बदलते रहते हैं, परंतु ज्ञान वह संपदा है जो मनुष्य के साथ हर परिस्थिति में खड़ी रहती है। यह न केवल बाहरी सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि भीतर के अंधकार को भी दूर करती है।
ज्ञान ही मानव जीवन की सर्वोत्तम सम्पदा है। इसका उपार्जन केवल पुस्तकों के अध्ययन से नहीं, बल्कि अध्ययन, अभ्यास, आचरण और सत्संग; इन चार स्तंभों के माध्यम से होता है। जब ज्ञान व्यवहार में उतरता है, तभी वह “विद्या” बनता है; अन्यथा वह केवल सूचना मात्र रह जाता है।
विद्या का एक अद्भुत गुण है—यह खर्च करने से घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है। जितना हम इसे बाँटते हैं, उतना ही यह हमारे भीतर और प्रखर होती जाती है। यह हमें केवल सफल नहीं बनाती, बल्कि सार्थक भी बनाती है।
विद्या का वास्तविक उद्देश्य केवल जीविका अर्जन नहीं है, बल्कि जीवन का निर्माण है। यह हमारे भीतर छिपे अविद्या, राग-द्वेष, अहंकार और भ्रम जैसे अंतःविकारों को दूर करती है। जब चित्त निर्मल होता है, तब मनुष्य सही और गलत का भेद समझ पाता है। ज्ञान हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, विवेक बनाए रखना ही वास्तविक शक्ति है। सफलता का माप केवल उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि चरित्र और दृष्टिकोण भी है।
भारत की अमूर्त ज्ञान परम्परा अत्यंत समृद्ध रही है। यह केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि उन महापुरुषों के जीवन में जीवित है, जिन्होंने अपने आचरण से ज्ञान को साकार किया। उपनिषदों में कहा गया कि “तद्विज्ञार्थं गुरुमेवाभिगच्छेत्” अर्थात् उस परम ज्ञान की प्राप्ति के लिए श्रद्धा और पुरुषार्थ के साथ सद्गुरु का आश्रय लेना चाहिए।
गुरु केवल ज्ञान देने वाला नहीं होता, बल्कि वह हमारे भीतर की संभावनाओं को जागृत करने वाला मार्गदर्शक होता है। वह हमें यह सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं, बल्कि योग और आत्मोन्नति है।
आज के समय में जब सूचनाओं की बाढ़ है, तब सही ज्ञान का चयन करना और उसे जीवन में उतारना और भी आवश्यक हो गया है। केवल डिग्री या प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेना ही शिक्षा नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है जो हमें आत्मनिर्भर बनाए। हमारे भीतर नैतिकता और संवेदनशीलता विकसित करे और हमें समाज के लिए उपयोगी व्यक्ति बनाए
यदि ज्ञान के साथ विनम्रता नहीं है, तो वह अहंकार बन जाता है। यदि ज्ञान के साथ सेवा भाव नहीं है, तो वह केवल स्वार्थ का साधन बनकर रह जाता है। हर व्यक्ति के भीतर अपार संभावनाएँ छिपी होती हैं। विद्या उन संभावनाओं को जागृत करने की कुंजी है।
जब आप सीखने की प्रक्रिया को अपनाते हैं, तो आप हर दिन स्वयं को बेहतर बनाते हैं। जब आप ज्ञान को आचरण में लाते हैं, तो आप अपने साथ-साथ समाज को भी ऊँचा उठाते हैं। इसलिए कभी यह मत सोचिए कि सीखने का समय निकल गया है। विद्या का मार्ग अनंत है, और इस मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी दरिद्र नहीं होता।
अंततः यही कहा जा सकता है कि विद्या केवल जीवन जीने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को समझने की कला है। यह हमें बाहरी उपलब्धियों के साथ-साथ आंतरिक शांति भी प्रदान करती है।
आइए! सभी यह संकल्प लें कि हम केवल ज्ञान अर्जित ही नहीं करेंगे, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारकर स्वयं को और समाज को प्रकाशमान करेंगे। विद्या ही वह दीप है, जो स्वयं भी जलता है और दूसरों को भी प्रकाश देता है।