पूज्य “सद्गुरुदेव अवधेशानन्द सरस्वती” जी ने कहा–
“वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनां आत्मनस्तुष्टिरेव च॥”
वेद शब्द “विद्” धातु से बना है, जिसका आशय जानने अर्थात् ज्ञान प्राप्त करने से है। वेद ज्ञान-विज्ञान के अप्रतिम स्रोत्र हैं, वैदिक ज्ञान न केवल हमारे भौतिक उत्कर्ष का आधार है, अपितु यथार्थ बोधक है। अत: वैदिक ज्ञान का प्रसार करना विश्व समुदाय को उपकृत करना है। वैदिक ज्ञान का प्रसार एवं साहित्य का जितना पठन-पाठन होगा, मानवीय मूल्य उतने ही उच्चतर स्तर पर संस्थापित होंगे। सामान्यत: शिक्षा हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। दान की शास्त्रों में बड़ी महिमा बताई गई है और सब प्रकार के दानों में से विद्या का ही श्रेष्ठ है। हम सभी के भीतर श्रेष्ठ भगवदीय संभावनाएँ सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं जिनका प्रकटीकरण वेदविद्या के द्वारा ही होता है।
भारतीय परम्परा से प्राप्त ज्ञान पूरी तरह वैज्ञानिक है। आज विश्व को भारत की देन है– भारतीय वैदिक ज्ञान। इस ज्ञान को भारतीय ऋषियों ने अपने आचरण से आत्मसात् कर जीया है। हजारों साल पहले ही हमारे वेदों में वैज्ञानिक तथ्य तथा विज्ञान के सूत्र दिए जा चुके हैं। शिक्षा संस्कारित करती है और विद्या पूर्णता प्रदान करती है। समता लाती है, अनुशासित करती है, सही दिशा प्रदान करती है। हमारी संस्कृति केवल कैरियर की बात नहीं करती, हमारी संस्कृति कैरियर से ज्यादा चरित्र की बात करती है। दुनिया के क्षेत्र में आगे बढ़ने वाले लोग यदि अपने चरित्र के क्षेत्र में पिछड़ जाते हैं, तो यह उनके जीवन की बहुत बड़ी हानि है, ऐसी हानि से बचना चाहिए। अंत में कहना होगा कि हमारी स्कूली शिक्षा में सांस्कृतिक शिक्षा का संतुलित समावेश किया जाना चाहिए। इसके लिए पाठ्यक्रम संशोधित किए जाने चाहिए। भारतीय शिक्षा प्रणाली में छात्रों को संस्कार दिए जाना अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जो कि अब ना के बराबर होता जा रहा है। यह एक चिन्ता का विषय होना चाहिए।
शिक्षा और संस्कार एक-दूसरे के पूरक हैं। शिक्षा मनुष्य के जीवन का उपहार है जो व्यक्ति के जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल देती है और संस्कार जीवन का सार है, जिसके माध्यम से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण और विकास होता है। जब मनुष्य में शिक्षा और संस्कार दोनों का विकास होगा, तभी वह परिवार, समाज और देश के विकास की ओर अग्रसर होगा। शिक्षा का तात्पर्य सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि चारित्रिक ज्ञान भी होता है जो आज की इस भागदौड़ वाली दिनचर्या में हम भूल चुके हैं। हम अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में नामांकन दिलाकर संतुष्ट हो जाते हैं, परन्तु यह हमारी लापरवाही है जो हमारे बच्चों को भ्रमित कर कर रही है। आज के अधिकांश बच्चे संभ्रांत तो हैं, पर विवेकशील नहीं। भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। समाज में पुरुष प्रधान व्यवस्था होने के उपरान्त भी महिलाओं को बराबरी का स्थान एवं बराबर का सम्मान देने की प्रथा है। तथाकथित आधुनिक समाज आधुनिकता का हवाला देकर पुरातन संस्कारों को दकियानूसी बताकर, दुत्कार रहा है और अंग्रेजी सभ्यता को अपना रहा है। हमारी मातृभाषा, मातृभूमि की उपेक्षा होने के कारण संस्कारों के अभाव में आधुनिक समाज का चारित्रिक पतन, अपराधीकरण एव धनलोलुप हो जाना आम है, जो युवाओं को कुप्रवृत्तियों की तरफ धकेल कर नशा आदि का आदी बना देता है। इससे हमारे देश का भविष्य चिन्तनीय हो सकता है।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि यह अत्यन्त चिन्ता का विषय है कि रोजगार के शोध में, सुन्दर भविष्य का सपना संजोए ग्रामीण भारत, कर्मठ भारत शहरों और विदेशों को पलायन कर रहा है। यहाँ यह बात ध्यान देने की है कि पुरातन संस्कारों की नीवँ अत्यन्त गहरी है, अन्यथा भारतीय समाज अपनी वास्तविक पहचान कब का खो चुका होता। हमारे माता-पिता पुरातन संस्कारों और रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हैं। धार्मिक स्थलों का भ्रमण कर उन पर आस्था प्रकट करते हैं। यह बच्चों के कोमल हृदय पर अचूक छाप छोड़ता है। समाज के बदलाव के लिए व्यक्ति में अच्छे गुणों की आवश्यकता होती है और उसकी नीवँ हमें हमारे बच्चों की बाल्यावस्था में ही रखनी पड़ती है। बच्चों को तीन गुण आत्मसात् करवाने की आवश्यकता है। ज्ञान, कर्म और श्रद्धा। इन्हीं तीन गुणों से उनके जीवन में बदलाव आयेगा और वे परिवार, समाज और देश सेवा में आगे बढ़ेंगे।
आज जो राष्ट्रव्यापी अनैतिकवाद प्रदूषण हमारे समाज और देश को दूषित कर रहा है, उसका कारण सिर्फ बच्चों में संस्कार और शिक्षा का अभाव है – जिसका दोषी कौन है? हम झूठे दिखावे के लिए अपने भारतीय अमूल्य संस्कारों के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। पाश्चात्य सभ्यता का आँखें मूँदकर अनुसरण करना ही हमें और हमारे बच्चों को पथभ्रष्ट कर रहा है। इसे रोकना होगा। हम समझें कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य सुन्दर चरित्र है। शिक्षा मनुष्य के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का पूर्ण और संतुलित विकास करती है। बच्चों में सांसारिक और आध्यात्मिक शिक्षा दोनों की नितान्त आवश्यता है, क्योंकि शिक्षा हमें जीविका देती है और संस्कार जीवन को मूल्यवान बनाते हैं। शिक्षा में ही संस्कार का समावेश है। यदि हम अपने बच्चों में भारतीय संस्कृति, भारतीय परम्पराएँ, भाईचारा, एकता आदि का बीजारोपण करते हैं तो उनमें स्वत: संस्कार आ जाते हैं, जिसका दायित्व माता-पिता, परिवार और शिक्षक का होता है। आज हम अनेक विद्यालयों में देखते हैं कि शिक्षा केवल नाम के लिए रह गई है, शिक्षा के द्वारा प्राचीन समय में हमें ज्ञान तथा नैतिक मूल्यों को सिखाया जाता था।
परन्तु आज यह बहुत बड़ा प्रश्न हमारे सामने उठ खड़ा हुआ है कि आज की शिक्षा प्रणाली के द्वारा हम वही ज्ञान और नैतिक मूल्यों को अर्जित कर रहे हैं, शिक्षार्थियों को केवल उत्तीर्ण करने के लिए उन्हें ज्ञान दिया जाता है, या फिर कह सकते हैं कि उन्हें तैयार किया जाता है! शिक्षा में संस्कारों की कमी के चलते आज के युवा पीढ़ी के विद्यार्थी हर वो अनुचित कार्य कर रहे हैं जिसके करने के विचार से ही मन घबरा एवं सहम सा जाता है। संस्कार का तात्पर्य अशिक्षित बनना नहीं है। संस्कार का उद्देश्य है – सही शिक्षा पाना। शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं है। किताबी ज्ञान तो कोई भी पा सकता है, लेकिन संस्कार युक्त शिक्षा ऐसी शिक्षा है जो ज्ञान के साथ-साथ जीवन को भी पवित्र बनाए।
आजकल लोग कैरेक्टर की उपेक्षा करते हैं, केवल कैरियर बनाने की बात सोचते हैं। हमारी संस्कृति केवल कैरियर की बात नहीं करती, बल्कि हमारी संस्कृति कैरियर से ज्यादा चरित्र की बात करती है। दुनिया के क्षेत्र में आगे बढऩे वाले लोग यदि अपने चरित्र के क्षेत्र में पिछड़ जाते हैं, तो ये उनके जीवन की बहुत बड़ी हानि है, ऐसी हानि से बचना चाहिए। अन्त में कहना होगा कि हमारी स्कूली शिक्षा में सांस्कृतिक शिक्षा का संतुलित समावेश किया जाना चाहिए। इसके लिए पाठ्यक्रम संशोधित किए जाने चाहिए। हमारी चुनी हुई सरकारें इस विषय में शीघ्र पहल करें तो अत्यन्त उत्तम होगा।