● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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(यह ललकारभरा खुला संदेश उन सबके लिए है, जो सर्वथा व्यावहारिक ‘जनवरी से दिसम्बर-माह’ को भारतीय संदर्भ मे स्वेच्छा से अपनाते आ रहे हैँ और अपना मूल चरित्र भी प्रकट करते आ रहे हैँ। इस विषय पर आपसबकी खुली प्रतिक्रिया आमन्त्रित है।)
आपसब जिस थाली मे खाते आ रहे हैँ, उसका सम्मान करना कबतक सीखेँगे? आपसब ‘जनवरी से दिसम्बर’ तक सारे कुकर्म और सुकर्म करते आ रहे हैँ। उसके बिना आपमे से किसी का अस्तित्व तक नहीँ; चाहेँ जन्ममृत्यु का प्रमाणपत्र, एफ० आइ० आर०, अच्छे-बुरे कर्मो का लेखा-जोखा, बैंक-खाता, आधार कार्ड, पैन कार्ड, मृत्युप्रमाणपत्र आदिक होँ। वहाँ ‘चैत्र से फाल्गुन’ तक का कोई विवरण नहीँ रहता। तथाकथित कट्टर हिन्दू और सनातनी भी यहाँ मौन हैँ और नाम बदलने मे कथित हिन्दुओँ की सरकारेँ भी।
ऐसे लोग ‘मम्मी-डैडी’ करेँगे; मगर अपनी छद्म भारतीयता को प्रकट करते हुए, यह कहने का साहस नहीँ कर पायेँगे :– ये मेरे ‘आंग्ल मम्मी-डैडी’ हैँ। हाँ, ऐसे कृतघ्न लोग यह सीना ठोँककर अवश्य कहेँगे :– आंग्ल कैलेण्डर, आंग्ल दिनांक/तारीख़ एवं जो जड़ बुद्धि के लोग होँगे, वे कहेँगे :– ‘आंग्ल तिथि’; क्योँकि वैसे शातिर लोग मे दिनांक/तारीख़ तथा तिथि-मास मे अन्तर करने की सामर्थ्य नहीँ होती।
◆ इस विषय पर तथ्यात्मक एवं विचारोत्तेजक लेख शीघ्र सार्वजनिक करूँगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जनवरी, २०२५ ईसवी।)