● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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जब गली-गली, कूचे-कूचे ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का गीत ढोल, मजीरा, सारंगी, मृदंग के साथ गाया जा रहा था तब ऐसा लग रहा था, मानो बेटियोँ के लिए शिक्षा ‘स्वर्ग का द्वार’ खोल देगा और भारत ‘विश्वगुरु’ का तमगा पा जायेगा और हमारे देश की हर बेटी के हाथोँ मे किताब, कॉपी, क़लम, पेंसिल होँगी और उनका भविष्य आशामय दिखता हुआ, समुज्ज्वल होगा; परन्तु एक दशक के बाद भी उस गीत की अनुगूँज तक कानो से बाहर निकलकर जाने कहाँ विलुप्त हो गयी है। बेटियोँ की शैक्षिक स्थिति ‘निम्न से निम्नतर’ हो चुकी है।
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा बलन्द करनेवाले यह भी जानते हैँ कि वास्तव मे, आज देश मे साक्षरता और शिक्षा-दीक्षा की स्थिति कितनी चरमरा गयी है। जिन घरोँ मे माँ-बाप और अभिभावक अपनी बेटियोँ को ढंग से दो वक़्त का भोजन तक उपलब्ध नहीँ करा पाते; उनके पहनने-ओढ़ने-बिछाने की व्यवस्था करने मे पूर्णतः समर्थ नहीँ हो पाते, वे अपनी बेटियोँ और पाल्याओँ की शिक्षा की बात भला कैसे सोच सकते हैँ। यही कारण है कि उनके घरोँ मे बेटियोँ की शिक्षा की दशा और दिशा अत्यन्त शोचनीय (‘सोचनीय’ अशुद्ध है।) हो चुकी है; परन्तु इस यथार्थ और वास्तविकता को जानने-समझनेवाले लोग निश्शब्द बने हुए हैँ; आख़िर क्योँ?
वास्तव मे, विश्वभर मे महिलाओँ की औसत साक्षरतादर ७९.९ प्रतिशत है, जिसमे महिलाएँ ६२.३ प्रतिशत हैँ और पुरुष ८९.२ प्रतिशत। भारत के प्रसंग मे विचार करने पर ज्ञात होता है कि वहाँ महिला-साक्षरतादर मात्र ६५ प्रतिशत है, जोकि ऊँचे ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जी० डी० पी०)-वृद्धिवाले देश के लिए चिन्तनीय विषय बन जाता है। जब हम उक्त प्रतिशत की तुलना पुरुषवर्ग की ८२ प्रतिशत-साक्षरतादर से करते हैँ तब महिलावर्ग की दयनीय अवस्था प्रत्यक्ष होने लगती है। भारत मे बहुसंख्य बेटियोँ का विवाह अल्पावस्था मे कर दिया जाता है, जो सामाजिक दबाव मे समय से पूर्व गर्भधारण करने के कारण अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद शिक्षा के बन्धन से मुक्त कर दी जाती हैँ। बेटियोँ को बचाने की ढोलक बजानेवाले सम्भवत: भूल जाते हैँ कि बेटियोँ का निरक्षर रहना उनके (बेटियोँ) लिए अतीव घातक बन चुका है; क्योँकि आँकड़े बताते हैँ कि निरक्षर महिलाओँ मे मृत्युदर अधिक होती है। इतना ही नहीँ, प्रजनन-दर मे भी वे आगे हैँ। हम यदि सर्वेक्षणो पर विश्वास करेँ तो साक्षर महिला की तुलना मे असाक्षर महिलाएँ अत्यधिक शिशुओँ को जन्म देती हैँ। एक साक्षर महिला के परिवार मे औसत रूप से दो बच्चे होते हैँ, जबकि असाक्षर महिला के औसतन छ: बच्चे होते हैँ। यही कारण है कि निरक्षर माताओँ की बेटियोँ के साक्षर होने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए साधन का अभाव होता है। यहाँ उन्हेँ और उनके समाज मे जनसंख्या-शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना अनिवार्य हो जाता है; क्योँकि उनकी बेटियाँ भी निरक्षर और अशिक्षित बनकर रह जाती हैँ, जो आगे चलकर एक ‘पैतृक परम्परा’ का रूप धारण कर लेती है।
समस्या के मूल मे जाने पर ज्ञात होता है कि इसके लिए सामाजिक नकारात्मकता और पूर्वग्रह (यहाँ ‘पूर्वाग्रह’ अशुद्ध है।) उत्तरदायी हैँ। हमे यह भी समझना होगा कि देश की एक-तिहाई जनसंख्या निर्धनता-रेखा से नीचे दिख रही है। भारतीय समाज का एक भाग ऐसा है, जहाँ बच्चियोँ का जन्म लेना, ‘अभिशाप’ माना जाता है। यही कारण है कि विगत तीन दशक (‘दशकोँ ‘ अशुद्ध है।) मे दो करोड़ बेटियोँ का गर्भपात कराया जा चुका है। इतना ही नहीँ, जो बच जाती हैँ वा बचा ली जाती हैँ, उनमे से ४५ प्रतिशत का विवाह १८ वर्ष की अवस्था से पहले ही कर दिया जाता है। वे सब बेटियाँ अशिक्षित रह जाती हैँ। महिलावर्ग के प्रति सामाजिक हिंस्र, अपराध और लैंगिक भेदभाव इतना प्रभावी हो गया है कि बेटियोँ के पाठशाला जाने का अवसर मिलने पर भी माँ-बाप और अभिभावक उन्हेँ नहीँ पढ़ाते। ग्रामीण क्षेत्रोँ मे बेटियोँ को निकटतम पाठशाला मे पहुँचने के लिए भी पैदल ही अधिकतम दूरी तै करनी पड़ती है। यही कारण है कि बेटियोँ के माँ-बाप और अभिभावक उन्हेँ किशोरी वा तरुणी की अवस्था प्राप्त करते-करते, शिक्षण-संस्था से हटा लेते हैँ। ऐसी शिक्षण-संस्थाएँ ८० प्रतिशत हैँ, जहाँ प्रसाधन (शौचालयादिक) की सुविधा नहीँ है। इधर, शिक्षण-संस्थाओँ मे अवयस्क लड़कोँ की लड़कियोँ के प्रति जिसप्रकार का अपराधबोध जाग्रत् हुआ है, वह बेटियोँ के माता-पिता के लिए चिन्ता का विषय बन जाता है।
विश्व के ३७० लिंग-विशेषज्ञोँ ने एक सर्वेक्षण किया था, जिसमे बताया गया कि भारत ऐसा देश है, जो महिला-स्थिति की दृष्टि से ‘जी– २०’ के निकृष्टतम श्रेणी मे आता है।
स्मरणीय है कि भारत की संसद् की ओर से ४ अगस्त, २००९ ई० को ‘निश्शुल्क एवं अनिवार्य बालशिक्षा-अधिकार- अधिनियम’ (शिक्षा का अधिकार-अधिनियम) पारित किया गया था, जिसमे संविधान के ‘अनुच्छेद २१– ए’ के अन्तर्गत ‘छ: से चौदह वर्ष’ की अवस्था की बालक-बालिकाओँ के लिए शिक्षा को ‘निश्शुल्क’ और ‘अनिवार्य’ शिक्षा के महत्त्व के स्वरूप का वर्णन है। परिषदीय पाठशालाओँ मे जिस दिन से निश्शुल्क भोजन, गणवेश, पुस्तकादिक की व्यवस्था समाप्त कर दी जायेगी; विद्यार्थियोँ की संख्या ‘नगण्य’ हो जायेगी और उक्त अधिनियम की हवा निकल आयेगी। सबसे बुरी स्थिति उत्तरप्रदेश की है, जिसके कारण के मूल मे शासकीय नीति, नीयत और निर्णय हैँ। नियमत: परिषदीय पाठशालाओँ की स्थिति से एक किलोमीटर की परिधि मे कोई निजी शिक्षण-संस्था नहीँ संचालित की जा सकती, जबकि इस नियम की धज्जी उड़ाते हुए, बड़ी संख्या मे शिक्षण-संस्थाएँ चलायी जा रही हैँ और सरकार ‘मौन’ बनी हुई है। ऐसे मे, जब सरकार परिषदीय पाठशालाओँ मे बच्चोँ की घटती संख्या के बहाने ५,००० पाठशालाओँ के शिक्षणकार्य बन्द करने की शुरूआत (‘शुरुआत’ अशुद्ध है।) करती है तब एक तार्किक आक्रोश उभरता है; क्योँकि सरकार अपनी अकर्मण्यता को छिपा लेती है।
बेटियाँ हवा मे नहीँ पढ़ायी जातीँ। सरकार ने जन्म से पूर्व और जन्म के पश्चात् तक बेटियोँ के ‘गुप-चुप दारुण आँसू’ और ‘चीत्कार करते सार्वजनिक आँसू’ की पृष्ठभूमि को कभी समझने का प्रयास किया है? बेटियोँ के स्वास्थ्य, पोषण, सेवा तथा नियोजन के लिए सरकार ने कौन-सी अतिरिक्त व्यवस्था की है? एक बेटी को पालन-पोषण करने से लेकर संदूषित सामाजिक मनोवृत्ति और विकृति से बचाकर, संरक्षित-सुरक्षित करते हुए, माँ-बाप और अभिभावकगण को क्या-कुछ नहीँ झेलना पड़ता है; समाज की पतित दृष्टि हमारी बेटियोँ को यह अनुभव कराने लगती है कि छायावादी कृती कृतिकार जयशंकर प्रसाद की यह प्रसिद्ध काव्यपंक्ति “नारी! तुम तो श्रद्धा है” मात्र एक आदर्शात्मक उपदेश है; यथार्थ और वास्तविकता का तो पुट है ही नहीँ। आदर्श की अभिव्यंजना प्राय: थोथी मर्यादा की रक्षा के लिए की जाती है।
किसी चिन्तन और विश्लेषण का आधार समग्र मे होता है, तभी सम्यक् निष्कर्ष और निष्पत्ति से साक्षात् होता है।
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ नामक सरकारी ताबीज़ को विषैले सर्प के रूप मे देश की प्रत्येक अजन्मी-जन्मी बेटियोँ के गले मे इस तरह से लपेट दिया गया है, मानो ‘अवसरवादी’ सर्प डँसने के लिए कुण्डली मारे घात लगाये हो, जो आये-दिन अपना मर्मान्तक दंश-प्रभाव से हमारी बेटियोँ को न मरने दे रहा है और न जीने।
उक्त प्रकार के स्वार्थपरक नारा लगानेवालोँ से आज प्रत्येक माँ-बाप और अभिभावक का प्रश्न है :– हमारी सारी शक्ति और पूँजी बेटियोँ को बचाने और पढ़ाने मे समाप्त होती जा रही है, फिर भी बेटियोँ के लिए कहीँ-कोई ठोस और विश्वसनीय आर्थिक आधार नहीँ दिख रहा है, क्योँ?
जब हमारी बेटियाँ सन्ध्या-समय ७ बजे अपने घर मे हमलोग की आँखोँ के सामने नहीँ होती हैँ तब हम अज्ञात भय से आक्रान्त होकर उन्हेँ अपने ‘पास’ दिखने के लिए व्यग्र हो जाते हैँ। ऐसे मे, नाराबाज़ी करनेवालोँ! हमारी बेटियोँ की सुरक्षा के लिए तुमने ऐसी कौन-सी ठोस नीति बनायी है, जिसके कारण हम माँ-बाप और अभिभावकगण मुक्त होकर अपना सुखद और सुरक्षित पारिवारिक जीवन-यापन कर सकेँ। कई दशक से लोकतन्त्र के सीने पर अपनी नाकामी के मूँग दलनेवाले हम माँ-बाप को ऐसी कौनसी सुविधा दी है, जिससे हम अपनी बेटियोँ को बचाते हुए, उन्हेँ समुचित शिक्षा उपलब्ध करा सकेँ? कोई एक सुविधा बताओ, जो हमारी बेटियोँ की सुरक्षा और शिक्षा के लिए दी हो? उन सरकारी पाठशालाओँ की बात बिलकुल मत करना, जहाँ की बहुसंख्य पाठशालाओँ मे अयोग्यता का बोलबाला है और जो विवशता की परिचायिका हैँ। हमारे रुपयोँ पर ‘मिड-डे-मिल’ की योजना क्रियान्वित करनेवाले ऐश करते आ रहे हैँ और हमारी बेटियोँ को भोजन के नाम पर ‘विषाक्त’ भोजन देते आ रहे हैँ, जिनमे आयेदिन काक्रोच, छिपकली, कीड़े-मकोड़े मिलते हैँ। दिवसवार जो भोजन-प्रबन्धन है, उनकी उपेक्षा करते हुए, भोजन कराया जाता है। ऐसे प्रकरण आयेदिन प्रकाश मे आ रहे हैँ; परन्तु सरकार और उनके अधीनस्थ अधिकारी निश्शब्द बने रहते हैँ; अन्तत:, क्योँ?
प्रवेश कराने से लेकर पुस्तक, स्टेशनरी, गणवेशादिक ख़रीदने, कोचिंग-संस्थाओँ मे पढ़ाने, फॉर्म भरवाने, भ्रष्टाचारियोँ के मुँह भरने आदिक मे माँ-बाप और अभिभावकोँ के लाखोँ रुपये व्यय हो जाते हैँ; ऊपर से उनपर तरह-तरह के औचित्यरहित ‘सरकारी कर’ मध्यम और निम्न-वर्गोँ के माँ-बाप की कमर तोड़ते आ रहे हैँ।
ऐसे सत्ताधारी लोग ‘सत्ता की खोखली राजनीति’ करने मे लगे हुए हैँ और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के आधारहीन नारे लगाकर, सामाजिक भ्रम उत्पन्न किये हुए हैँ; परन्तु जब चार, सात, आठ, नौ वर्ष की बेटियोँ का अपहरण कर लिया जाता है; उनके साथ ‘सामूहिक दुष्कर्म’ किया जाता है; अपहरण कर लिया जाता है तथा उनकी नृशंस हत्या कर दी जाती है तब सब मौन रह जाते हैँ; पुलिस-संरक्षण दूर-दूर तक नहीँ दिखता, बल्कि आरोपी (आरोप लगानेवालोँ) के ही विरुद्ध काररवाई करने की धमकी दी जाती है। हम इस प्रकार की घृणित प्रशासनिक नीति, नीयत और निर्णय को प्रतिदिन देखते, पढ़ते और सुनते आ रहे हैँ, जिनमे से अधिकतर प्रकरण ऐसे होते हैँ, जिनमे ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के नारा लगानेवाले ही प्रत्यक्ष रूप मे संलग्न दिखते हैँ। अपने राजनीतिक दल की बदनामी और स्वयं के चेहरे पर कालिख़ पुतने के डर से ऐसे लोग, जो अपने थोबड़े पर ‘नेता’ की पदवी चिपकाये चलते हैँ, पुलिस-प्रशासन और न्यायिक संस्थाओँ की सम्बन्धित जाँच की दिशा को प्रभावित करते आ रहे हैँ। ऐसे घृणित और निर्लज्ज लोग उन बेटियोँ का वर्गीकरण करके अपनी बेहद घटिया मंशा ज़ाहिर करते आ रहे हैँ। उन्हेँ वे बेटियाँ ‘अपनी बेटियोँ ‘ के रूप मे नहीँ दिखतीँ; उन्हेँ तो ‘हिन्दू-बेटी’, ‘मुसल्मान-बेटी’, ‘ब्राह्मण-बेटी’, ‘क्षत्रिय-बेटी’, ‘वैश्य-बेटी’, ‘सिक्ख-बेटी’ ‘ईसाई-बेटी, ‘दलित-बेटी’, ‘प्रवासी बेटी’ इत्यादिक बेटियोँ के रूप मे ‘हमारी बेटियाँ’ दिखती हैँ, जिसके पीछे केवल ‘सत्ता की गर्हित राजनीति’ बनाये रखने की मंशा रहती है। ऐसे लोग की संवेदना ‘उधार’ और ‘किराये’ की होती है, आस्था, विश्वास तथा श्रद्धा की नहीँ।
समय बहुत बलवान है। हो सकता है, वह ऐसे कुत्सित लोग को भी ‘बेटी का दर्द’ अनुभव करने का अवसर दे दे और उनमे से पत्नीसहित होकर जो पत्नीरहित हैँ; सन्तानरहित हैँ, उन सबको प्रभावित माँ-बाप की ‘हाय’ ऐसी लगे कि ‘वे सब’ कहीँ के न रहेँ।
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