‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ और ‘सर्जनपीठ’ का संयुक्त राष्ट्रीय आयोजन
‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ और ‘सर्जनपीठ’ के संयुक्त तत्त्वावधान में कल (२७ मई) प्रयागराज से विद्वान् पं० प्रभात शास्त्री की १०३वीं जन्मतिथि के अवसर पर ‘आचार्य पं० प्रभात शास्त्री की शब्दसत्ता और महत्ता’-विषयक एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद आयोजन किया गया था।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए, जबलपुर से संस्कृत के प्रख्यात विद्वान् प्रो० रहसबिहारी द्विवेदी ने बताया, “पूज्य डॉ० प्रभात शास्त्री कवि और काव्यशास्त्री होने के साथ ‘रामवर्म की टीका’ से युक्त अध्यात्म रामायण और संस्कृत-रागकाव्यों के प्रशस्त सम्पादक के रूप में विख्यात हैं। ‘रागकाव्यविमर्श: नामक उनके ग्रन्थ की भूमिका लिखने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मुझे उनसे संस्कृतकाव्य रचने की प्रेरणा प्राप्त हुई है। उनकी जन्मतिथि पर मैं अपनी प्रणामांजलि अर्पित करता हूँ।”
मुंगेर विश्वविद्यालय (बिहार) में संस्कृत के सहायक प्राध्यापक डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय ने बताया, “पं० प्रभात शास्त्री की संस्कृत-निष्ठा अद्वितीय थी। वे जीवनभर संस्कृतभाषा के प्रचार-प्रसारार्थ संलग्न रहे। शास्त्री जी सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्व विद्यालय वाराणसी से साहित्याचार्य और विद्यावाचस्पति की उपाधियाँ अर्जित करके संस्कृतसेवा में लग गये थे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के प्रधानमन्त्री रहते हुए, उन्होंने हिन्दी के साथ ही अनेक संस्कृत- ग्रन्थों का सम्पादन किया था।कविनृपतिरामभट्ट-प्रणीत गीतगिरीशम् एवं स्वामी प्रबोधानन्द सरस्वती-कृत संगीतमाधवम् का उन्होंने अनुवाद और सम्पादन किया। इसके साथ ही उन्होंने संस्कृत के ग्यारह अन्य ग्रन्थों के भी अनुवाद और सम्पादन किये थे। पं० प्रभात शास्त्री जी की अनेक कविताएँ संस्कृत पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं थीं। उन्हें अनेक संस्कृतसंस्थाओं ने अपने विशिष्ट सम्मानों से सम्मानित किया था।शास्त्री जी की संस्कृतसेवा प्रत्येक संस्कृतज्ञ के द्वारा चिर काल तक स्मरण की जायेगी।”
वाराणसी से वरिष्ठ पत्रकार विश्वेश्वर कुमार ने कहा, “साहित्य- जगत् में आज हमें पण्डित प्रभात शास्त्री-जैसा संस्कृत और हिन्दी पर पकड़ रखनेवाला विद्वान् शायद मिले। तीर्थराज प्रयाग में जन्मे शास्त्री जी ने वाराणसी के सम्पूर्णानन्द संस्कृत वि० वि० से ‘अध्यात्म रामायण’ विषय पर डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी। वे सम्पूर्णानन्द संस्कृत वि०वि० के गौरवशाली दिन हुआ करते थे। यहाँं आज भी लोग उन्हें याद करते हैं, प्रभात शास्त्री- सरीखा संस्कृत पर धाराप्रवाह संभाषण और संवाद करनेवाला विशेषज्ञ समकालीन में कोई नहीं दिखता। संस्कृत के उस महान् कवि ने राष्ट्रभाषा की भी प्राणपण से सेवा की। हिंदी साहित्य सम्मेलन का देशभर में विस्तार किया और नयी ऊँचाइयाँ दीं। मैंने दो वर्ष प्रयागराज में बिताये हैं और शिद्दत से प्रभात जी की रिक्तता महसूस की। मुझे लगता है, उस मनीषी को अपनी सरकारों से उतना सम्मान नहीं मिला, जिसके वे सच्चे हक़दार थे।”
परिसंवाद-आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “आचार्य पं० शास्त्री का स्मरण आते ही हमारे सम्मुख संस्कृतभाषा और साहित्य की शास्त्रीयता प्रकट होने लगती है। ओजस्विता के साथ धाराप्रवाह संवाद करनेवाले पं० शास्त्री आचार्यत्व और पाण्डित्य के संवाहक लक्षित होते थे। यही कारण है कि आज भी उनकी विद्वत्ता अपराजेय है। दु:ख इस बात का अवश्य है कि उनके समकालीन और पश्चात् की पीढ़ी ने पं० शास्त्री से उनका पाण्डित्य ग्रहण नहीं किया। हो सकता है, उन सभी की अहम्मन्यता बाधक सिद्ध हुई हो। हमें एक नयी चेतना और सुदृढ़ इच्छाशक्ति के साथ उनके अवरुद्ध ‘ज्ञानगंगा’ को लोक-चेतना के धरातल पर प्रवहमान (‘प्रवाहमान’ अशुद्ध शब्द है।) करना है। इसके लिए हम सभी को समवेत स्वर में संकल्प करना होगा, तभी उनके प्रति अर्पित की जा रही हमारी भावांजलि-शब्दांजलि-श्रद्धांजलि सार्थक कहलायेगी।”
हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रबन्धमन्त्री और आचार्य पं० शास्त्री के पौत्र कुन्तक मिश्र ने बताया, ” परम आदरणीय प्रभात शास्त्री जी के अन्दर एक बहुत बड़ी कला थी और वह यह कि उनको यदि किसी भी जानकारी की ज़रूरत होती थी तो उसको प्राप्त करने के लिए वे अपने स्रोत बना कर रखते थे। जैसे कि मैं एक उदाहरण बताऊँ– निराला बालिका विद्यालय, दारागंज, प्रयागराज, जिसके वे प्रबन्धक थे, के बहुत-से बच्चे उनके घर के सामने से जाया करते थे तो प्रायः हर कक्षा की दो-तीन बालिकाओं से बात करके वे पता लगा लेते थे कि किस कक्षा में किस विषय की अध्यापिका कैसा पढ़ा रही है, फिर वे उसी आकलन के आधार पर अपनी राय प्रधानाचार्य को दे दिया करते थे और जो सुधार अपेक्षित होते थे, वे उसके लिए निर्देशित कर देते थे।” कुन्तक मिश्र ने आगे बताया, “पाण्डुलिपियों के संग्रह को मैं हिन्दी साहित्य सम्मेलन के लिए उनके द्वारा किये अनेक कार्यों में एक बहुत बड़ी उपलब्धि के रूप में देखता हूँ। अब आवश्यकता है, उनके अधूरे कार्य को पूरा करने का।”
नोएडा से वरिष्ठ पत्रकार डॉ० प्रभात ओझा ने कहा, “डॉक्टर प्रभात शास्त्री एक ऐसे व्यक्तित्व के स्वामी थे, जिनके पूरे साहित्यिक अवदान का सम्यक् मूल्यांकन नहीं किया जा सका है। यह भी एक सच्चाई है कि ऐसा नहीं हो सकने के पीछे उनका राष्ट्रभाषा-प्रचारक होना ही है। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री के रूप में उनके कार्य से साहित्य-जगत् का एक पक्ष खिन्न रहा करता था, इसलिए उस पक्ष ने शास्त्री जी के साहित्यिक योगदान को उपेक्षित रखा। सच यह है कि वे संस्कृत की परम्परा से आये और उन्होंने बहुत कुछ रचा है। शायद इस योगदान का प्रमाण है कि संस्कृत-परम्परा की उनकी ‘शास्त्री’ उपाधि को देश के किसी भी विश्वविद्यालय की पी-एच०डी०/डी० फिल्० से कमतर नहीं माना जाता। इस संस्कृत-संस्कृति और हिन्दीसेवी पर बहुत कुछ किया जाना शेष है।”
राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज, मलदहिया, वाराणसी से डॉ० प्रतिभा मिश्र का कहना था, “पण्डित प्रभात शास्त्री हिन्दी के उन्नयन के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। संस्कृत के संवर्द्धन में उन्होंने अपना जीवन लगा दिया था। धाराप्रवाह संस्कृत-संभाषण करने में वे दक्ष थे तथा वेद-वेदान्तों और शास्त्र-पुराणों से सम्बन्धित किसी भी विषय पर शास्त्रार्थ करने में पारंगत थे। उनके पाण्डित्य में मौलिकता थी। वे सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के मानद सदस्य भी थे।”
हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री और पं० प्रभात शास्त्री के पुत्र विभूति मिश्र ने सहभागियों के कृतज्ञता-ज्ञापन करते हुए कहा, “शास्त्री जी की हठधर्मिता देखते ही बनती थी। वे जो भी ठान लेते थे, कर दिखाते थे।” विभूति मिश्र ने आगे बताया, ” मैं बाबू जी को बचपन से ही देखता रहा। संस्कृत-भाषा के प्रति उनकी निष्ठा देखते ही बनती थी।”
इस प्रकार यह सारस्वत आयोजन सम्पन्न हो गया।