आज (२७ मई), जिनकी १०३वीं जन्मतिथि है।
प्रयागराज में एक-से-बढ़कर-एक विभूतियाँ रही हैं, जिनका मान-सम्मान देश में ही नहीं, अपितु देशान्तर में भी रहा है। उन्हीं में से आज हम संस्कृत और हिन्दी-भाषा के संवर्द्धन में अपना स्तुत्य योगदान करनेवाले आचार्य पं० प्रभात शास्त्री का स्मरण करेंगे, जिनकी आज (२७ मई) १०३वीं जन्मतिथि भी है। इस अवसर पर हमने प्रयागराज के प्रतिष्ठित विद्वज्जन-विदुषी से उनके विचार प्राप्त किये हैं।
भाषाविद्-भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का कहना है– आचार्य पं० प्रभात शास्त्री-जैसे प्रकाण्ड विद्वान् अब दिखते ही नहीं। मुझे गर्व है, आचार्य पं० शास्त्री के भाषाप्रवाह व्याख्यान के साथ जुड़ने का। कल-कल, छल-छल निनादिनी भागीरथी के प्रवाह की भाँति उनकी अभिव्यक्ति अति कर्णप्रिय रहती थी। भाषा-शुद्धता और शुचिता के प्रति वे कितने सजग और जागरूक रहते थे, इसे समझने के लिए उनके द्वारा सम्पादित संस्कृत-त्रैमासिकी ‘संगमनी’ का अनुशीलन किया जा सकता है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषाविभाग के प्राध्यापक शिवप्रसाद शुक्ल ने बताया–
पं० प्रभात शास्त्री का व्यक्तित्व काफी संघटनात्मक था। उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से मालवीय और टंडन के स्वप्नों को तमाम विसंगतियों के बाद भी भली प्रकार साकार किया। उनकी साहित्यिक रुचि के चलते देश-विदेश के हिन्दी-विद्वान् सम्मेलन में आते थे।
एस० एन० मनोहर महाविद्यालय, प्रयागराज में सहायक प्राध्यापक डॉ० विद्युल्लता मौर्य ने आचार्य पं० प्रभात शास्त्री को इस रूप में स्मरण किया– शास्त्री जी १९७५ से १९९९ ई० तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री थे। उनका सांघटनिक कौशल देखते ही बनता था। एक बात याद आयी। शास्त्री जी यदि किसी को सम्बोधित करते थे तो ‘बन्धु’ कहकर। प्रयाग-स्थित लोकनाथ की लस्सी, इमरती, रसगुल्ला उन्हें बहुत भाते थे।