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चीन को चारों ओर से घेरने की भारतीय रणनीति

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

भारत-चीन-सीमा पर आज (३ जुलाई) जाकर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का सीमा पर डटे भारत के सैनिकों से मिलना; घायल भारतीय सैनिकों को सुखद आश्वासन देना तथा सैनिकों के मध्य शौर्यपूर्ण उद्बोधन करना आदिक हमारी राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत रहे हैं। प्रधानमन्त्री ने यद्यपि यह क़दम विलम्ब में उठाया है तथापि वे ‘साधुवाद’ के पात्र हैं। इससे हमारे सैनिकों का मनोबल और बढ़ेगा। कितना अच्छा रहता, यदि नरेन्द्र मोदी हमारे सैनिकों की हत्या के ठीक दूसरे दिन ही वहाँ पहुँच गये रहते।

औसत भारतीय जानता है कि चीन भारत की तुलना में अधिक ताक़तवर है; परन्तु नरेन्द्र मोदी ने जिस शैली में श्रीकृष्ण की ‘बुद्धिमत्ता’ और विष्णु के ‘सुदर्शनचक्र’ की शक्ति के दृष्टान्त प्रस्तुत किये थे, उनसे सिद्ध हो जाता है कि युद्ध सैन्य और शस्त्रास्त्रबल के सहारे ही नहीं जीता जा सकता।
शत्रुसेना चीन के सम्मुख ताल ठोंकना समय की माँग रही है। दूसरी ओर, चीन ने भी समझ लिया है कि छ: दशकों-पूर्व के भारत और अब के भारत में ‘धरती और आकाश’ का अन्तर है। आज का भारत धरती, आकाश, पाताल, अन्तरिक्ष, आग, पानी– सर्वत्र अपनी अपराजेय सामरिक शक्ति का प्रदर्शन करता आया है, इसलिए चीन जान चुका है कि भारत की सीमाओं से जुड़ी उसकी सामरिक शक्ति की विस्तारवादी नीति सफल हो ही नहीं सकती। वैसे भी भारत समय-समय पर अपनी सामरिक प्रभुता से अन्तरराष्ट्रीय जगत् को अवगत कराता आ रहा है। लौहमहिला इन्दिरा गांधी के प्रधानमन्त्रित्व काल में परमाणु-विस्फोट कर भारत ने शेष विश्व को अपनी सामरिक महत्त्वाकांक्षा से अवगत करा दिया था और आगे चलकर, उदारवादी नेता अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में उसका विकराल रूप सम्पूर्ण विश्व ने देख लिया था।
इतना ही नहीं, वर्तमान में विश्व के लगभग १८० देश भारत के साथ हैं। रूसी परिसंघ के साथ भारत का मिग और सुखोई युद्धक विमानों के क्रय के लिए किये गये क़रार से भारत का सर्वाधिक विश्वसनीय मित्र रहा ‘रूस’, जो इधर कुछ वर्षों से भारत के हाथों से फिसलता आ रहा है और संयुक्त राज्य अमेरिका के पक्ष में भारत के खड़ा होने के कारण चीन के समर्थन में जाता दिख रहा है, को अपने पक्ष में करने की उक्त राजनय नीति कारगर ठहर सकती है।

बहरहाल, अन्तरराष्ट्रीय राजनीति का पलड़ा चीन के पक्ष में बहुत हलका दिख रहा है। इसका सर्वाधिक प्रमुख कारण ‘कोविड-१९’ नामक विषाणु से सम्पूर्ण विश्व में खलबली मचा देनेवाली चीन की रणनीति रही है। इस कारण समूचे विश्व की आर्थिक स्थिति लड़खड़ाती दिख रही है। इससे चीन भी अछूता नहीं है। चीन को ताइवान पानी पिला चुका है, उसे भूलना नहीं चाहिए, किसी अन्य संस्करण के रूप में उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ जुलाई, २०२० ईसवी)