‘सच’ ‘सच’ ही होता है, कब तक भागते रहोगे?

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ढाबों और अन्य प्रकार के शाकाहारी भोजनालयों में जब भी मैं भोजन करने के लिए जाता हूँ तब अधिकतर भोजनालयों में ‘व्यावहारिक समाजवाद’ देखता हूँ। मैं भोजन ग्रहण करने के लिए एक भोजनालय में पहुँचता हूँ। जैसे ही कुर्सी पर बैठता हूँ, १३-१४ वर्ष का एक बालक पहुँचता है। वह मेज पर कपड़ा रगड़ते हुए प्रश्न करता है, “बाबू जी! क्या लेंगे?” बेटे! ”क्या-क्या है?” फिर वही उपलब्ध भोजन को गिनाने लगता है। मैं अपना मनपसन्द भोजन उसे बता देता हूँ।

सभी उसे ‘छोटू’ कहकर पुकारते थे। अगली बार वह जल लेकर आता है और गिलास भरकर चला जाता है। मैं उससे पूछता हूँ, “बेटे! तुम्हारा असली (शुद्ध शब्द ‘अस्ली’ है।) नाम क्या है?” वह घबरा जाता है और यह कहकर चला जाता है, “बाबू जी! रोटी निकल चुकी है; थाली लेकर आता हूँ।”

मैं उसका पीछा नहीं छोड़ता हूँ। दूसरी बार पूछता हूँ तो धीरे से कहता है,”बाबू जी! हम मुसलमान हैं।” “शाबाश बेटे! यह धरम-वरम मन का भरम है। तुम शान के साथ अपना काम कर रहे हो; किसी की गरदन तो नहीं काट रहे हो? अपने काम में लगे रहो।” उसका मन मेरी बातों में लगने लगता है, फिर वह कहता है, “बाबू जी! वो जो सलाद काट रहा है, वो भी मुसलमान है। मेरा पड़ोसी है। वही यहाँ मुझे लाया था।” जब वह तीसरी रोटी लेकर आया तब मैंने पूछा, “तो क्या बेटे! यहाँ सब मुसलमान ही हैं?” मेरे प्रश्न को लोकते हुए बोल पड़ता है, “नहीं बाबू जी। यहाँ यादव भी है। पटेल भी, एक चमार है। उसे लोग पण्डित जी कहकर बुलाते हैं। तिवारी रोटी सेंकता है। मालिक पंजाबी है। उसी ने पण्डित नाम रखा है।” खटिकाना से दो औरतें आती हैं। वो जो बरतन साफ़ कर रही है, वही है।” “बेटे! तुम कहाँ तक पढ़े हो?” “बाबू जी! सात तक।” “आगे क्यों नहीं पढ़े?” “रुपये की किल्लत थी।” अब्बा नशेड़ी हैं। अम्मी सिलाई पर जाती हैं।”

मैंने उस बालक को ‘दस रुपये’ छुपाकर दिये थे। जिसका प्रभाव रहा कि वह रुचि लेकर जवाब देता रहा। मैं भोजन कर चुका था, फिर अपने मूल विषय के साथ जुड़ चुका था। मैं उस पूरे सभागार का बारीक़ी के साथ अध्ययन करने लगा। भोजन कर रही भीड़ में तिलक-चन्दन-कण्ठीधारी थे; तथाकथित दबंग परिवार भी दिख रहे थे, जो शानदार कारों से आये थे और उन-जैसे लोग, जो अपने दरवाज़े के सामने से किसी चमार-पासी-खटिक, काछी, कुर्मी आदिक की बारातें निकालने का विरोध करते हैं, यहाँ तक कि मारने-पीटने पर उतारू तक हो जाते हैं; अपने कुएँ पर जातीय दुर्भावना के कारण उन्हें फटकने तक नहीं देते। वहाँ होटल-मालिक से यह पूछने का साहस नहीं कर पाते– तुम्हारे होटल में किन धर्मों और जातियों के लोग काम करते हैं?

वास्तव में, वहाँ मुझे वास्तविक समाजवाद दिखा था, साथ ही भारतीय समाज का ढकोसलावाद और व्यवहार भी। हमें इस दलदल से समाज को बाहर निकालना होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ अगस्त, २०२० ईसवी।)