यदि मनुष्य अपने लिए ही जीवन जी रहा होता है; सभी अच्छी बातें और अच्छे परिणाम उसी के पक्ष में ही दिखें, ऐसा सोच विकसित कर रहा होता है; सामनेवाले को अपनी बातों और सम्मोहक आश्वासन-पाश में आबद्ध कर, अपना उल्लू सिद्ध कर रहा होता है तो उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका चातुर्य उसे पातक गह्वर की ओर धकेल (‘ढकेल’ अशुद्ध शब्द है।) रहा होता है, जिसकी क्रिया-प्रतिक्रिया उसके ‘अवचेतन’ में हो रही होती हैं और अतिवादी अवसर को ‘चेतना’ के धरातल पर लाने के लिए व्यग्र दिख रही होती हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ अगस्त, २०२१ ईसवी।)