
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वर्ष २०१४ में कच्चे तेल की क़ीमत ११० डॉलर प्रति बैरल थी और तब पेट्रोल की क़ीमत ७० रुपये प्रति लीटर थी। वर्ष २०१७ में कच्चे तेल की क़ीमत ४९.३ डॉलर प्रति बैरल है और पेट्रोल की क़ीमत ८० रुपये प्रति लीटर कर दी गयी थी तथा वर्ष २०१८ में ७५ रुपये प्रति बैरल है तो पेट्रोल की क़ीमत ८२ रुपये के लगभग पहुँचा दी गयी है। वहीं दूसरी ओर, देश की सरकार १५ देशों को ३२ से ३४ रुपये प्रति लीटर से पेट्रोल का निर्यात कर रही है। इसके लिए भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है और उसे परिशुद्ध (रीफाइण्ड) कर, निर्यात करता है; परन्तु विडम्बना है कि वही भारत की सरकार अपनी जनता को दोगुने-ढाई गुने दाम पर पेट्रोल उपलब्ध कराती है।
ज्ञातव्य है कि सरकार मात्र पेट्रोल से एक दिन में ९०० करोड़ रुपये की कमाई करती है। वर्तमान सरकार के समय में पेट्रोल की इक्साइज ड्यूटी में नौ बार वृद्धि की जा चुकी है, जिसका कोई औचित्य नहीं है।
कच्चे तेल के मूल्यों में जब आधे-से-अधिक की गिरावट आयी थी तब इसी सरकार पेट्रोल के दामों में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी कर, अपने बेईमान नज़रिये का परिचय दे चुकी है। शासन संचालित करनेवाले कितने निर्दय, धूर्त्त-मक्कार तथा लुटेरे हैं, इससे सुस्पष्ट होता जा रहा है।
क्या वित्त-वाणिज्यमन्त्रालय के ठीकेदारों को नहीं मालूम, जब कच्चे तेल की क़ीमत घटने लगती है तब पेट्रोल-डीजल आदिक के मूल्य स्वत: कम होने लगते हैं परन्तु केन्द्र-सरकार देशवासियों को दोनों हाथों से दूहती आ रही है। देशवासी भी कम अपराधी नहीं हैं, जो बेहया सरकार का गुणगान करते थक नहीं रहे हैं। यही कारण है कि आज केन्द्र-सरकार मनबढ़ हो गयी है।
अरुण जेटली नाम का जीव अर्थव्यवस्था के मामले में ‘ज़ीरो’ (०) है। यह जब से देश की अर्थव्यवस्था को सँभाले हुए है तबसे अब तक आर्थिक तन्त्र पूरी तरह से चरमरा गया है। सरकार का ख़ज़ाना तो भरता जा रहा है परन्तु देशवासियों का ‘बैंक बैलेंस’ ख़तरे के निशान को पार कर चुका है।
‘भारतीय जनता पार्टी’ नामक दल के लोग, जिनकी भागीदारी केन्द्र-शासन में है, अपने-अपने मन्त्रालय के माध्यम से कराये जानेवाले लोकमंगलकारी कार्यों के सन्दर्भ में पूरी तरह से असफल सिद्ध होते दिख रहे हैं।
सरकार चाह ले तो पट्रोल-डीजल के दामों में कमी आ सकती है। केन्द्र-सरकार इक्साइज ड्यूटी कम कर दे और राज्य-सरकारें ‘वैट’ में कमी कर दें। प्रश्न है, सरकार जी०एस०टी० के दाइरे में पेट्रोल-डीजल को क्यों नहीं लाती? यदि ऐसा हो जाता है तो पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में लगभग २५ रुपये की स्वत: कमी आ जायेगी; परन्तु यह सरकार नितान्त निर्मम है; देश की जनता को दूह लेना चाहती है।
हाँ, इस अहम्मन्य सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि ‘ग्लोबल मार्केट’ में ‘क्रूड ऑयल’ के लिए वर्ष २०१२ से २०१७ तक का सफर राजनीतिक खेल बदलनेवाला साबित हो चुका है। यू०पी०ए०-सरकार पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में बढ़ोत्तरी और उसके कारण महँगाई होने से जनता के आक्रोश काषष् शिकार हो चुकी है। केन्द्र-राज्य-सरकारों की जनविरोधी नीतियों के कारण पेट्रोल १०० रुपये और डीजल ९० रुपये प्रति लीटर तक पहुँच सकता है। डीजल के महँगा होने से सबसे अधिक असर प्याज पर पड़ेगा। यदि कहीं ‘नासिक’ की प्याज पर प्रभाव पड़ा तो प्याज का दाम आसमान छू लेगा और फिर प्याज इतिहास दोहराने का काम करेगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। प्याज अनेक सरकारों की क़ब्र खोद चुकी है।
जिस व्यक्ति को वित्त-वाणिज्य की समझ नहीं रही है, उसे यदि इतने महत्त्व का दायित्व दे दिया जायेगा तो वह कर ही क्या सकता है। भगवान् यदि गंजे को नाख़ून देंगे तो वह क्या करेगा? यही कारण है कि प्रत्येक माह खुदरा महँगाई लगभग २% बढ़ रही है और उस पर नियन्त्रण पाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किया जा रहा है। आयात-निर्यात की नीतियों में कहीं-कोई सन्तुलन नहीं दिख रहा है; रुपये का अवमूल्यन देश की आर्थिक नीतियों पर क़रारा प्रहार कर रहा है और यह अरुण जेटली नामक कृत्रिम अर्थशास्त्री ‘कूपमण्डूक’ बना हुआ है!
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १८ सितम्बर, २०१८ ईसवी)