हम तो काँटा हैं मोहब्बत का छला क्या करते ?

जगन्नाथ शुक्ल…✍(प्रयागराज)


हम तो काँटा हैं मोहब्बत का छला क्या करते?

गुल  ही  नादाँ  है  भँवरे  से  गिला क्या करते?
हम  तो  हर हाल में  शाखों  से जुड़े रहते हैं;

दिल   के  तूफ़ाँ   में  मुला   क्या   करते?
तिश्नगी  देख  के  सहरा  की  सहम  जाते  हैं;

सूखी नदिया हैं रियासत की भला क्या करते?
हम  वो  शमां  हैं  जो  चेहरे पे चमक ला देते;

नक़्बपोशों से भरी महफ़िल में जला क्या करते?
चुप है कुछ सोच के बौनी-सी सियासत में ‘जगन’

हम  तो   सरसिज हैं अँधेरे में खिला क्या करते?


©जगन्नाथ शुक्ल…✍(प्रयागराज) ९६७००१००१८