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भारत ने इंग्लैण्ड से टी-२० शृंखला ३-२ से जीती

समीक्षक– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ऐसा पहली बार हुआ था कि एक ही स्टेडियम में लगातार पाँच टी-२० मैचों की शृंखला खेली गयी थी। यद्यपि ‘टॉस’ इंग्लैण्ड के कप्तान मॉर्गन ने जीतकर क्षेत्ररक्षण करने का फ़ैसला लिया था तथापि भारतीय दल ने बल्लेबाज़ी करते हुए, अपनी प्रभुता स्थापित कर ली थी। मुक़ाबला विश्व के वरीयताक्रम में ‘प्रथम दल’ इंग्लैण्ड और ‘द्वितीय दल’ भारत के साथ हो रहा था। दोनों दल २-२ मैच जीत चुके थे। पाँचवाँ और अन्तिम मैच दोनों दलों के लिए “करो या मरो” का था; क्योंकि इस मैच को जीतनेवाले दल को ही ‘सिकन्दर’ बनना था। पहली बार विराट कोहली और रोहित शर्मा अन्तरराष्ट्रीय टी-२० मैच में आरम्भिक बल्लेबाज़ी करते हुए दिख रहे थे; एक कप्तान तो दूसरा उपकप्तान। इतना ही नहीं, इस शृंखला में पहले विकेट के लिए सर्वाधिक रनों (१० रन प्रति ओवर की गति के साथ ९४ रन) की आक्रामक भागीदारी दिख रही थी। रोहित शर्मा विस्फोटक बल्लेबाज़ी करते रहे और देखते-ही-देखते, मात्र ३४ गेंदों में ६४ रन बनाकर आऊट हुए थे, तब भारत मात्र ९ ओवरों में ९४ रन का स्कोर खड़ा कर चुका था। उसके बाद सूर्यकुमार यादव की बारी थी। अपने विस्फोटक शैली में वे छक्के-चौके से अहमदाबाद के दर्शकरहित स्टेडियम को आबाद करते रहे। इंग्लैण्ड के गेंदबाज़ :– आर्चर, आदिल, वुड, जॉर्डन बेअसर दिखते रहे। काश! दर्शक रहते। दिलो दिमाग़ का भरपूर उपयोग करते हुए, सूर्यकुमार ने तीसरे क्रम में खेलते हुए, १७ गेंदों में ३२ रन बनाये थे और १३.२वें ओवर में १४३ पर दूसरा विकेट गिर चुका था, जो कि क्रिस जॉर्डन के संतुलनभरे प्रयास का परिणाम था। उस दौरान कप्तान विराट कोहली संयम के साथ खेलते हुए, अपने दोनों सहयोगियों को प्रहार करने के लिए अवसर देते रहे। चौथे खिलाड़ी के रूप में हार्दिक पाण्ड्या को प्रोन्नत करते हुए, तेज़ी में रन की गति बढ़ाने के लिए अवसर दिया गया था। १५.२वें ओवर में ३६ गेंदों पर ही विराट कोहली का २८वाँ अर्द्धशतक बन चुका था, तब भारत के १६२ रनों पर २ विकेट गिर चुके थे। १५वें ओवर में पाण्ड्या आक्रामक तेवर में आ चुके थे; फिर क्या था, १८वें ओवर में भारत २०० रन पर पहुँच चुका था।

मैच का अन्तिम ओवर था। गेंदबाज़ी ऑर्चर की थे; अपेक्षाकृत संतुलित गेंदबाज़ी की थी, तब तक भारत ने २० ओवरों में २ विकेट पर २२४ रन बना लिये थे। विराट कोहली ने ५२ गेंदों पर ८० रन (अविजित) और हार्दिक पाण्ड्या के १७ गेंदों पर ३९ रन (अविजित) बना चुके थे।

निश्चित रूप से भारत ने मात्र दो विकेट पर २२४ रनों का विशाल स्कोर खड़ा कर इंग्लैण्ड पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल चुका था।

इंग्लैण्ड के सम्मुख इस शृंखला पर ३-२ से अधिकार करने के लिए एक ज़बरदस्त चुनौती थी। बल्लेबाज़ी में स्वयं को सिद्ध करनेवाले भारतीय दल को क्षेत्ररक्षण में भी स्वयं की प्रभुता स्थापित करने की बारी थी। आरम्भिक गेंदबाज़ के रूप में अपना ४८वाँ मैच खेल रहे भुवनेश्वर कुमार के सामने इंग्लैण्ड के सलामी जोड़ी जेसन रॉय और बटलर की थी। विराट कोहली कुछ समय के लिए मैदान से बाहर थे; नेतृत्व करने का भार उपकप्तान रोहित शर्मा पर था। भुवनेश्वर के पहले ओवर की पहली ही ‘इन-स्विंग’ गेंद जेसन रॉय की ‘लेग’ और ‘मिडिल स्टम्प’ शून्य पर उखाड़ ले गयी। दूसरे क्रम के १९४ के रन-रेटवाले खिलाड़ी डेविड मलान की बारी थी। हार्दिक पाण्ड्या अनावश्यक रूप से मलान को ‘शॉर्ट-पिच’ गेंद करते रहे, जिसका परिणाम चौका-छक्का-चौका के रूप में दिखा था। हार्दिक अपने पहले ओवर में ही १८ रन लुटा चुके थे। यहाँ पर भारतीय नेतृत्व का दोष था। ऐसा इसलिए कि उन्हें वेंकट सुन्दर को लाना चाहिए था, जिन्होंने इसी शृंखला में मलान को तीन बार आऊट किये थे। शून्य पर एक विकेट के गिर जाने के बाद भी इंग्लैण्ड के बल्लेबाज़ औसत रन-दर के प्रति सजग थे। यही कारण था कि पाँचवें ओवर में एक विकेट पर ५४ रन बना चुके थे। इसका प्रमुख कारण था कि दूसरे छोर से कसी हुई गेंदबाज़ी नहीं हो रही थी। दूसरी ओर, ओस के कारण गेंद में नमी आ जाती थी, जिसे बार-बार साफ़ करना पड़ता था। ९.२ ओवर में इंग्लैण्ड के बल्लेबाज़ १०० रन बना चुके थे। इतने ओवर में भारत का स्कोर भी इसी के आस-पास था। आक्रामक बल्लेबाज़ी कर रहे बटलर और मलान ने १०वें ओवर में १०४ रनों की साझेदारी कर चुके थे। मात्र ३३ गेदों में मलान ५२ रन बना चुके थे और ३० गेंदों में बटलर के ५० रन पूरे हो चुके थे। कौन हारेगा और कौन जीतेगा, बताना बहुत ही मुश्किल था।

दूसरे विकेट के लिए की जा रही चुनौतीपूर्ण साझेदारी अन्तत:, १३२ रनों पर टूट चुकी थी। बटलर पैवेलियन लौट चुके थे। शार्दूल ठाकुर का एक ही ओवर में दो विकेट लेना भारत को जीत की ओर ले जाना था।

चौदहवाँ और पन्द्रहवाँ ओवर भारत के लिए महत्त्वपूर्ण था; क्योंकि दोनों ही ओवरों में इंग्लैण्ड के तीन विकेट गिर चुके थे। १४० पर तीसरा विकेट गिर चुका था और कुछ ही देर बाद चारों मैच में असफल रहे मलान इस निर्णायक मैच में ६८ रन की शानदार योगदान कर चुके थे।

जो इंग्लैण्ड जीत के बहुत क़रीब दिख रहा था, एक-के-बाद-एक विकेट के गिरते रहने से वह जीत से दूर होता दिख रहा था; क्योंकि अब उसे २३ गेंदों पर ८० रन बनाने थे और उसके पाँच खिलाड़ी आऊट हो चुके थे।

जीत भारतीय योद्धाओं के क़दम चूमने की लालसा जी रही थी।

इस शृंखला में भारत २-१ से पिछड़ रहा था; परन्तु समझ-बूझ के साथ चौथे मैच को बराबरी पर लाकर (२-२) स्वयं के लिए वर्तमान शृंखला को जीवित कर रखा था।

पाँचवें और अन्तिम मैच में भारत ने इंग्लैण्ड को ३६ रनों से पराजित कर शृंखला ३-२ से जीतते हुए, ‘पेटीएम ट्राफ़ी’ पर आधिपत्य करते हुए, आगामी विश्व कप प्रतियोगिता के लिए अपनी प्रबल दावेदारी प्रस्तुत कर दी है। इंग्लैण्ड ने २० ओवरों में ८ विकेटों पर १८८ का स्कोर कर सका था। भारत की ओर से भुवनेश्वर कुमार ने ४ ओवरों में १५ रन देकर २ विकेट और शार्दूल ठाकुर ने ४५ रन देकर ३ विकेट लिये थे।

इस पाँचवें और अन्तिम मैच में ‘प्लेयर ऑव़ द मैच’/’मैन ऑव़ द मैच’ का पुरस्कार १ लाख रुपये चेक़ के रूप में भारतीय गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार को दिया गया था। विराट कोहली को शृंखला में सर्वाधिक २३१ रन बनाने के लिए चेक़ के रूप में ढाई लाख रुपये का ‘मैन ऑव़ द सीरीज़’ पुरस्कार दिया गया था।

कुल मिलाकर, यह शृंखला इंग्लैण्ड की ओर झुकी नज़र आ रही थी; परन्तु भारतीय खिलाड़ियों ने चौथे मैच से आत्मसंयम, इच्छाशक्ति, प्रतिबद्धता तथा जिगीषा (जीतने की इच्छा) पर ध्यान केन्द्रित कर, स्वयं के प्रदर्शन को सिद्ध किया है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० मार्च, २०२१ ईसवी।)