पत्रकारिता और लेखन मेरे ‘होने को’ प्रमाणित करते हैं

● आज (३ मई) ‘विश्वप्रेस-स्वतन्त्रता-दिवस’ (‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ है, न कि ‘अन्तरराष्ट्रीय (यहाँ ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ अशुद्ध अनुपयुक्त है।), ‘स्वतन्त्रता-दिवस’/ ‘अन्तरराष्ट्रीय प्रेस-स्वतन्त्रता-दिवस’ वा विश्व पत्रकारिता- दिवस’।
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◆ ‘युनेस्को एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ के ‘जनसूचना-विभाग’ की ओर से २९ अप्रैल-३ मई, १९९१ ई० तक नामीबिया की राजधानी ‘विण्डहोक’ मे एक ‘सेमिनार’ का आयोजन किया गया था, जिसमे उक्त संस्थाओं के संयुक्त तत्त्वावधान मे ‘एक स्वतन्त्र और बहुलवादी अफ़्रीकी प्रेस’ को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था, जिसमे ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ (‘विश्व प्रेस-स्वतन्त्रता- दिवस’) के नाम से प्रतिवर्ष एक वैश्विक आयोजन करने का सुझाव दिया गया था। उस प्रस्ताव को दिसम्बर, १९९३ ई० मे आयोजित युनेस्को-अधिवेशन के छब्बीसवेँ सत्र मे स्वीकार कर लिया गया था। उसी समय निर्णय किया गया था कि वर्ष मे प्रत्येक ३ मई को विश्वस्तर पर ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ का आयोजन किया जायेगा।

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‘पत्रकारिता के क्षेत्र मे एक साप्ताहिक समाचारपत्र से लेकर दैनिक समाचारपत्रों मे कार्य करने के अनुभव ने मेरे सारस्वत जीवन को एक व्यापक फलक दिया है। देश के चार पत्रकारिता-संस्थानो और तीन न्यूज़ (समाचार), फ़ीचर (प्रसंगलेख) तथा रिपोर्टिंग (संवाद) सिण्डिकेटों (अभिकरणो) मे ‘निदेशक’ के पद-दायित्व ने सिखा दिया है कि जीवन मे पत्रकारिता की कितनी उपयोगिता और महत्ता है। इसका सारा श्रेय अपने अक्खड़ मिज़ाज, अपनी हठधर्मिता, दुर्धर्ष जीवन जीने की अपनी कला-शैली, अपने अध्यवसाय, अध्ययन, अनुशीलन, अभ्यास एवं अभाव मे भी ‘भावदर्शन’ करने की सामर्थ्य को देता हूँ।

यही कारण है कि पत्रकारिता और किसी भी प्रकार की सर्जनधर्मिता मेरे लिए ‘हस्तामलक’ रही है। समय-समय पर इच्छाशक्ति इतनी प्रबल होती रही कि ‘पत्रकारिता और जनसंचार’ का परिदृश्य अधोटंकित कृतियों के माध्यम से अपने प्रकाशन के क्रम मे इसप्रकार समुपस्थित होता रहा :–
१- पत्रकारिता : परिवेश और प्रवृत्तियाँ
२- जनसंचार : दृश्य-परिदृश्य
३- मीडिया : दृष्टि और सन्दर्भ
४- मीडिया : आयाम और प्रतिमान
५- चमत्कार : संचार के
६- साक्षात्कार : विधा और संदर्भ
७- मीडिया और प्रेस-विधि

पत्रकारीय यात्रा का अगला सारस्वत प्रवास होगा, ‘समग्र मीडिया-मन्थन’। वर्षों से ‘मीडिया-मन्थन’ करता आ रहा हूँ; परन्तु न तो ‘विष’ की प्राप्ति हो रही है और न ही ‘अमृत’ की, जबकि दोनो ही मेरे लिए अपरिहार्य हैं; जीवन मे ‘विषमय’ बनना भी ‘अमृत’ के प्रभाव को संतुलित करता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ मई, २०२४ ईसवी।)