अप्रासंगिक होती भारतीय जातिव्यवस्था

 डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


देश के शीर्षस्थ न्यायमन्दिर ‘उच्चतम न्यायालय’ के विधिज्ञ न्यायाधीशगण ‘भारत’ से ‘जाति-व्यवस्था’ सदैव के लिए समाप्त करने-हेतु , स्वत: संज्ञान करते हुए, कोई लोकवादी निर्णय करने की स्थिति में आ सकते हैं; क्योंकि जातीयता का विष-बेल इतना विस्तार पा चुका है कि जब तक जाति-भावना की विकृतियों पर प्रहार नहीं किया जायेगा तब तक भारतीय समाज उन्नति नहीं कर सकता। यदि ऐसा नहीं होता है तो आनेवाला कल जाति-बन्धन पर प्रहार करता हुआ दिखेगा।

भारत की संसद् के ठीकेदार इसे समाप्त करना नहीं चाहेंगे; क्योंकि उनकी रोज़ी-रोटी जातीयता के पल्लवन में दिखती है।

खान-पान, वैवाहिक सम्बन्ध तथा शेष सामाजिक जीवन-पद्धति का समग्र रूप में आदान-प्रदान अब समय-सत्य लक्षित हो रहा है। दृष्टि में वस्तुपरकता लाने पर ज्ञात होता है कि सदियों की जातीय जीवन-शैली में अब आमूल-चूल परिवर्त्तन हो चुका है। पहले जाति-आधार (वर्ण-व्यवस्था) पर कर्म करने की जो व्यवस्था की गयी थी, वह अब समाप्त हो चुकी है। जो कार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के लिए प्रतिबन्धित थे, उनसे विमुक्त होकर ये जातियाँ उन्मुक्त होकर अपना स्वयं का कारोबार कर रही हैं और समाज अब उन्हें स्वीकार कर चुका है। ऐसे में, सहज ही प्रश्न उठता है— भारत में जातीयता का पोषण करने का औचित्य क्या है?

कुछ जातियों के समूह को ‘दलित’ शब्द का सम्बोधन कर, उनके चिन्तन-स्तर का स्खलन करते हुए, उनका बौद्धिक और मानसिक स्तर विकृत कर, देश में राजनीति के ठीकेदार दशकों से अपना उल्लू सीधा करते आ रहे हैं; साथ ही सामाजिक समरसता को विषाक्त बनाते आ रहे हैं, जिसे कोई भी समझने का प्रयास नहीं कर रहा है; विशेषत: देश का प्रबुद्ध-वर्ग आपसी खींच-तान में ही लगा हुआ है और अपनी मूल भूमिका विस्मृत करता आ रहा है। यदि वह अपनी जागृति का परिचय प्रस्तुत नहीं करता है तो भारतीय समाज छिन्न-भिन्न होने की स्थिति से गुज़रता हुआ दिखेगा; अत: बुद्धिजीवी-वर्ग का परम दायित्व बनता है कि वह अपनी भूमिका को बहुविध समझे और विकृत सामाजिक व्यवस्था को सुसंस्कृत करे।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १ जुलाई, २०१८ ईसवी)